अथर्ववेद · ३ मुण्डक, ६ खण्ड

मुण्डक उपनिषद्

परा और अपरा विद्या का भेद, धनुष-बाण के रूपक से ध्यान, दो पक्षियों का प्रसिद्ध दृष्टान्त एवं "सत्यमेव जयते" का उद्घोष।

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परा और अपरा विद्या (मुण्डक 1, खण्ड 1)

मुण्डक उपनिषद्, अथर्ववेद से सम्बद्ध, अपने नाम में ही एक गहन संकेत छिपाए हुए है — "मुण्डक" का अर्थ है "मुण्डन करने वाला", अर्थात् जो अज्ञान को सिर के बालों की भाँति मूल से काटकर अलग कर दे। इसकी शैली भी अत्यन्त काव्यात्मक और ओजस्वी है, गद्य के बजाय पूर्णतः पद्य में रचित। उपनिषद् ज्ञान की एक दिव्य परम्परा के वर्णन से आरम्भ होती है — ब्रह्मा ने यह ज्ञान अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को दिया, अथर्वा ने अंगिरा को, अंगिरा ने भारद्वाज सत्यवह को, और उन्होंने अंगिरस ऋषि को — यह वंश-परम्परा स्वयं इस बात का प्रमाण है कि यह ज्ञान कोई मौलिक आविष्कार नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परम्परा से युगों-युगों तक संरक्षित एक पवित्र निधि है।

कथा में शौनक नामक एक महान गृहस्थ, विधिपूर्वक अंगिरा ऋषि के पास पहुँचकर पूछते हैं — "भगवन्, ऐसा क्या है जिसे जान लेने पर यह सब कुछ जाना हुआ हो जाता है?" यह प्रश्न अत्यन्त साहसिक है — यह किसी एक विषय के ज्ञान की माँग नहीं करता, बल्कि उस मूल ज्ञान की खोज करता है जिससे समस्त ज्ञान स्वतः ही समाहित हो जाए, ठीक वैसे ही जैसे मिट्टी को जान लेने पर मिट्टी से बनी समस्त वस्तुओं का ज्ञान स्वतः हो जाता है। अंगिरा उत्तर देते हैं कि ज्ञानी लोग दो प्रकार की विद्या बताते हैं — परा (उच्चतर) और अपरा (निम्नतर)।

अपरा विद्या में चारों वेद — ऋक्, यजुः, साम, अथर्व — तथा छह वेदांग सम्मिलित हैं: शिक्षा (उच्चारण-शास्त्र), कल्प (यज्ञ-विधि), व्याकरण, निरुक्त (शब्द-व्युत्पत्ति), छन्द और ज्योतिष। यह विद्या निश्चय ही मूल्यवान है, परन्तु यह अंततः शब्दों, नियमों और बाह्य क्रियाओं का ही ज्ञान है। इसके विपरीत, परा विद्या वह है जिसके द्वारा उस अक्षर (अविनाशी) तत्त्व को प्राप्त किया जाता है — वह तत्त्व जो अदृश्य है, अग्राह्य है, गोत्र-रहित, वर्ण-रहित, नेत्र-कर्ण-रहित, हाथ-पैर-रहित है, फिर भी नित्य, सर्वव्यापी, अत्यन्त सूक्ष्म और अविनाशी है, और जिससे यह समस्त भूत-सृष्टि उत्पन्न होती है।

यह परा-अपरा का भेद भारतीय ज्ञान-परम्परा की एक क्रांतिकारी अंतर्दृष्टि है — यह शास्त्रीय अध्ययन, वैज्ञानिक ज्ञान, भाषा-कौशल आदि किसी को भी तुच्छ घोषित नहीं करता, बल्कि उन्हें उनके उचित, सीमित स्थान पर रखता है। ये सब "अपरा" हैं, अर्थात् द्वितीयक — उपयोगी परन्तु अंतिम नहीं। जो व्यक्ति जीवन-भर केवल जानकारी और कौशल संचित करता रहे, परन्तु कभी उस मूल चेतना की खोज न करे जिससे यह सब जानकारी सम्भव होती है, वह उपनिषद् की दृष्टि में अभी भी अधूरा है — भले ही वह विश्व का सबसे बड़ा विद्वान ही क्यों न हो।

इस अध्याय का सार

जिस प्रकार मिट्टी को जान लेने पर मिट्टी से बनी सब वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है, उसी प्रकार परा विद्या — आत्म-ज्ञान — को पा लेने पर शेष समस्त अपरा विद्या अपने उचित, सीमित स्थान पर आ जाती है।

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अस्थिर नौकाएँ — कर्मकाण्ड की सीमा (मुण्डक 1, खण्ड 2)

यह खण्ड यज्ञ-कर्मकाण्ड के विस्तृत वर्णन से आरम्भ होता है — अग्नि-वेदी के निर्माण की विधि, अग्नि की सात ज्वालाओं के नाम (काली, कराली, मनोजवा आदि), यज्ञ में आहुति देने के उचित समय और मंत्र — यह सब इतनी बारीकी से वर्णित है कि पाठक को यह भ्रम हो सकता है कि उपनिषद् कर्मकाण्ड की प्रशंसा में लिखी गई है। परन्तु यह विस्तृत वर्णन एक बड़े उलटफेर की भूमिका मात्र है।

अचानक उपनिषद् एक चौंकाने वाला निर्णय सुनाती है — "प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म। एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापि यन्ति॥" — ये यज्ञ-रूपी अठारह प्रकार के कर्म वास्तव में अस्थिर, कमज़ोर नौकाओं के समान हैं, निम्न कोटि के कर्म हैं; जो मूढ़ लोग इन्हें ही सर्वश्रेष्ठ मानकर हर्षित होते हैं, वे बार-बार जरा और मृत्यु के चक्र में लौट आते हैं। यह उद्घोष मुण्डक उपनिषद् के सबसे साहसिक कथनों में से एक है — यह प्रत्यक्ष रूप से यज्ञ-कर्मकाण्ड की सीमाओं को उजागर करता है, यह कहते हुए कि ये केवल अस्थायी, अपूर्ण फल ही दे सकते हैं, अंतिम मुक्ति नहीं।

इसके पश्चात् वही उपमा दोहराई जाती है जो कठ उपनिषद् में भी आई थी — जो अविद्या के मध्य में रहते हुए भी स्वयं को बुद्धिमान समझते हैं, वे अंधों के पीछे चलने वाले अंधों की भाँति भटकते रहते हैं। इसके विपरीत, जो साधक वन में जाकर तप और श्रद्धा का पालन करते हैं, शान्त-चित्त, विद्वान, भिक्षा पर जीवन-यापन करते हैं, वे सूर्य के द्वार से होकर उस स्थान को प्राप्त होते हैं जहाँ वह अमर, अविनाशी पुरुष निवास करता है — यह देवयान मार्ग है, जो प्रश्न उपनिषद् में भी वर्णित हुआ था।

इस खण्ड की गहनतम शिक्षा यह है कि कर्मकाण्ड स्वयं में बुरा नहीं है, परन्तु जब उसे साध्य मान लिया जाए, अंतिम लक्ष्य समझ लिया जाए, तब वह मुक्ति के मार्ग में बाधा बन जाता है। एक नौका नदी पार करने के लिए उपयोगी है, परन्तु यदि यात्री नौका को ही अपना गंतव्य मान बैठे और उसी में जीवन-भर बैठा रहे, तो वह कभी दूसरे तट तक नहीं पहुँचेगा। ठीक इसी प्रकार, कर्मकाण्ड साधक को एक निश्चित सीमा तक ले जा सकता है — स्वर्ग, समृद्धि, यश — परन्तु परम मुक्ति के लिए उससे आगे, आत्म-ज्ञान की ओर बढ़ना अनिवार्य है।

इस अध्याय का सार

यज्ञ-कर्मकाण्ड अस्थिर नौकाओं के समान है — नदी पार करने के लिए उपयोगी, परन्तु जो नौका को ही गंतव्य मान बैठे, वह कभी दूसरे तट, अर्थात् परम मुक्ति, तक नहीं पहुँच पाता।

3

अग्नि की चिंगारियाँ — सृष्टि का उद्गम (मुण्डक 2, खण्ड 1)

दूसरे मुण्डक का पहला खण्ड सृष्टि की उत्पत्ति को एक अत्यन्त सुंदर उपमा से समझाता है — "यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः। तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति॥" — जैसे प्रज्ज्वलित अग्नि से हजारों चिंगारियाँ, अग्नि के ही समान स्वरूप वाली, उत्पन्न होती हैं, वैसे ही उस अक्षर (अविनाशी) तत्त्व से विविध प्रकार के प्राणी उत्पन्न होते हैं, और अंततः पुनः उसी में लौट जाते हैं। यह उपमा सृष्टि और सृष्टिकर्ता के बीच के सम्बन्ध को अत्यन्त स्पष्ट कर देती है — चिंगारियाँ अग्नि से भिन्न प्रतीत होती हैं, परन्तु वे अग्नि से पृथक् द्रव्य नहीं, अग्नि की ही अभिव्यक्तियाँ हैं।

इसके पश्चात् उपनिषद् उस दिव्य, अमूर्त पुरुष का वर्णन करती है, जिससे प्राण, मन, इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी — सब कुछ उत्पन्न होते हैं। इस पुरुष का विराट रूप वर्णित है — अग्नि उसका सिर है, सूर्य-चन्द्र उसके नेत्र हैं, दिशाएँ उसके कान हैं, वेद उसकी वाणी है, वायु उसका श्वास है, सम्पूर्ण विश्व उसका हृदय है, और पृथ्वी उसके चरण हैं — यह विराट-पुरुष वर्णन आगे भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय के विश्वरूप-दर्शन का पूर्वाभास देता प्रतीत होता है, यह दर्शाते हुए कि सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् ही उस परम पुरुष का शरीर है।

इस खण्ड की गहन शिक्षा यह है कि सृष्टि कोई पृथक्, स्वतंत्र वास्तविकता नहीं है — यह उसी अक्षर तत्त्व की तरंगें हैं, जैसे समुद्र से उठने वाली लहरें समुद्र से भिन्न पदार्थ नहीं। यह दृष्टिकोण भौतिक जगत् को न तो पूर्णतः वास्तविक मानता है (जैसा भौतिकवाद मानता है), न पूर्णतः मिथ्या (जैसा कुछ चरम अद्वैतवादी व्याख्याएँ मान सकती हैं) — बल्कि इसे उस एक अविनाशी तत्त्व की ही सापेक्ष, गतिशील अभिव्यक्ति के रूप में देखता है, जैसे चिंगारियाँ अग्नि की, या लहरें समुद्र की।

यह दर्शन साधक को एक विशेष प्रकार की दृष्टि प्रदान करता है — जब वह किसी भी प्राणी या वस्तु को देखे, तो उसे यह स्मरण रहे कि वह उसी एक अक्षर तत्त्व की एक चिंगारी मात्र है, अपने मूल स्रोत से भिन्न नहीं। यह दृष्टि आगे चलकर ईशावास्य उपनिषद् के "सर्वभूतेष्वात्मानम्" के सिद्धान्त से भी गहराई से जुड़ती है — जब सृष्टि की समस्त विविधता एक ही स्रोत की अभिव्यक्ति मान ली जाए, तो भेद-भाव और द्वेष का कोई आधार शेष नहीं रहता।

इस अध्याय का सार

जैसे अग्नि से हजारों चिंगारियाँ अग्नि के ही रूप में उत्पन्न होकर पुनः उसी में लौट जाती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण सृष्टि उस अक्षर तत्त्व से उत्पन्न होकर अंततः उसी में विलीन हो जाती है — विविधता सतही है, एकत्व मूल है।

4

धनुष और बाण — ध्यान का रूपक (मुण्डक 2, खण्ड 2)

यह खण्ड ध्यान-साधना के लिए एक अत्यन्त प्रसिद्ध और व्यावहारिक रूपक प्रस्तुत करता है — "प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥" — ॐ (प्रणव) धनुष है, आत्मा (उपासक) बाण है, और ब्रह्म को लक्ष्य कहा गया है; अप्रमत्त (सजग, एकाग्र) चित्त से इसका वेधन करना चाहिए, और तब बाण के समान साधक भी लक्ष्य में ही तन्मय हो जाता है, अर्थात् ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाता है। यह रूपक साधना की तीव्रता और एकाग्रता को उजागर करता है — जैसे धनुर्धर संधान करते समय अपनी सम्पूर्ण चेतना को लक्ष्य पर केंद्रित कर देता है, वैसे ही ब्रह्म-साक्षात्कार के लिए साधक को अपनी सम्पूर्ण चेतना को एकत्रित कर उस एक लक्ष्य की ओर निर्देशित करना होता है।

इसके पश्चात् आत्मा की सर्वव्यापकता का एक और भव्य वर्णन आता है — "यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः। तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः॥" — जिसमें आकाश, पृथ्वी, अंतरिक्ष, मन और समस्त प्राण बुने हुए हैं, उस एक आत्मा को ही जानो; शेष सभी बातें छोड़ दो — यही अमृतत्व का सेतु है। "सेतु" (पुल) शब्द का चयन अत्यन्त सार्थक है — यह आत्म-ज्ञान को इस लोक और उस अमर लोक के बीच का पुल बताता है, जिसे पार किए बिना कोई भी साधक जन्म-मृत्यु के इस तट से उस अमरत्व के तट तक नहीं पहुँच सकता।

यह खण्ड ध्यान के व्यावहारिक पक्ष पर विशेष बल देता है — यह केवल दार्शनिक सिद्धान्तों का वर्णन नहीं करता, बल्कि साधक को यह स्पष्ट निर्देश देता है कि उसे क्या करना है: ॐ को साधन बनाकर, अपनी चेतना को बाण की भाँति एकाग्र कर, उस एक लक्ष्य ब्रह्म की ओर निरंतर, अविचल भाव से निर्देशित करना है। जिस प्रकार एक कुशल धनुर्धर बार-बार अभ्यास से अपने लक्ष्य-भेदन में पारंगत होता है, उसी प्रकार साधक को भी बार-बार, धैर्यपूर्वक इस ध्यान-अभ्यास को दोहराना होता है, जब तक वह लक्ष्य के साथ पूर्णतः तन्मय न हो जाए।

इस रूपक की एक और गहन व्याख्या यह है कि तीरंदाज़ी में जैसे-जैसे साधक कुशल होता जाता है, धनुष, बाण और लक्ष्य — तीनों के बीच का भेद मिटने लगता है, वे एक ही सहज गति में विलीन हो जाते हैं। ठीक उसी प्रकार, गहन ध्यान में साधक (बाण), साधन (ॐ, धनुष) और साध्य (ब्रह्म, लक्ष्य) — तीनों के बीच का भेद मिट जाता है, और केवल एक अखण्ड अनुभूति शेष रह जाती है। यही "तन्मयता" इस खण्ड का अंतिम सन्देश है।

इस अध्याय का सार

जैसे कुशल धनुर्धर धनुष, बाण और लक्ष्य के भेद को मिटाकर तन्मय हो जाता है, वैसे ही ॐ को साधन बनाकर, एकाग्र चित्त से ब्रह्म का ध्यान करने वाला साधक भी अंततः ब्रह्म के साथ ही एकाकार हो जाता है।

5

दो पक्षी और सत्यमेव जयते (मुण्डक 3, खण्ड 1)

तीसरे मुण्डक का यह पहला खण्ड सम्पूर्ण उपनिषद्-साहित्य के सबसे प्रसिद्ध रूपकों में से एक के साथ आरम्भ होता है — "द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥" — दो पक्षी, सदा साथ रहने वाले मित्र, एक ही वृक्ष पर बैठे हैं; उनमें से एक उस वृक्ष के मीठे फल को खाता है, दूसरा बिना खाए केवल देखता रहता है। यह वृक्ष शरीर और संसार का प्रतीक है; एक पक्षी वह जीव है जो कर्मफल भोगने में लीन है, सुख-दुःख का अनुभव करता है; दूसरा पक्षी वह साक्षी-आत्मा (परमात्मा) है जो केवल द्रष्टा-भाव से सब कुछ देखता है, बिना किसी फल में उलझे।

अगला मंत्र इस रूपक के मनोवैज्ञानिक आयाम को उजागर करता है — जब तक जीव-पक्षी अपनी असहायता और सीमाओं में डूबा हुआ शोक करता रहता है, वह भ्रमित रहता है; परन्तु जब वह दूसरे पक्षी को — उस पूजनीय प्रभु की महिमा को — देख लेता है, तभी वह शोक-रहित हो जाता है। यह क्षण ही आत्म-साक्षात्कार का क्षण है — जब जीव यह पहचान लेता है कि वह अकेला भोक्ता मात्र नहीं, बल्कि उसके भीतर वह साक्षी-चेतना भी सदा विद्यमान थी, जो सुख-दुःख के परे, अविचल भाव से स्थित रहती है।

इसी खण्ड में वह अमर उद्घोष आता है जिसे आधुनिक भारत ने अपने राष्ट्रीय प्रतीक-चिह्न पर अंकित किया — "सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥" — सत्य की ही सदा विजय होती है, असत्य की नहीं; सत्य के द्वारा ही वह देव-मार्ग प्रशस्त होता है, जिससे होकर आप्तकाम (जिनकी समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो चुकी हैं) ऋषिजन उस स्थान तक पहुँचते हैं, जहाँ सत्य का वह परम निधान (कोश) स्थित है। यह घोषणा केवल नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक सत्य है — जो साधक सत्य के मार्ग पर दृढ़ रहता है, वही अंततः उस परम सत्य — ब्रह्म — तक पहुँचता है।

इस खण्ड का समापन उस दिव्य, विराट, अकल्पनीय स्वरूप के वर्णन से होता है, जो अणु से भी सूक्ष्म है, दूर भी है और निकट भी, हृदय की गुहा में अविभाज्य रूप से स्थित है। यह न आँख से, न वाणी से, न अन्य इन्द्रियों से, न तप या कर्मकाण्ड से — केवल शुद्ध, निर्मल बुद्धि (सत्त्व-शुद्धि) के प्रसाद से ही देखा जा सकता है। खण्ड के अंतिम मंत्र में कहा गया है कि सूक्ष्म आत्मा को उसी मन से जानना चाहिए जिसमें प्राण पाँच रूपों में प्रविष्ट हो चुका है — जब मन शुद्ध हो जाता है, तभी आत्मा उसमें प्रकाशित होती है।

इस अध्याय का सार

जब जीव-रूपी पक्षी अपने साथी, साक्षी-रूपी पक्षी की महिमा को पहचान लेता है, तभी वह शोक-मुक्त होता है — सत्य की ही सदा विजय होती है, और सत्य का यही मार्ग उस परम निधान तक ले जाता है।

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जिसे आत्मा स्वयं चुनता है (मुण्डक 3, खण्ड 2)

अंतिम खण्ड इच्छा और मुक्ति के सम्बन्ध की चर्चा से आरम्भ होता है — जो व्यक्ति निरंतर इच्छाओं का चिंतन करता रहता है, वह उन्हीं इच्छाओं के कारण बार-बार यहाँ-वहाँ जन्म लेता रहता है; परन्तु जिसकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो चुकी हैं, जिसका आत्मा कृतार्थ हो चुका है, उसकी समस्त इच्छाएँ इसी जीवन में, यहीं विलीन हो जाती हैं। यह सिद्धान्त कर्म-सिद्धान्त की गहनतम व्याख्या प्रस्तुत करता है — पुनर्जन्म का मूल कारण कर्म नहीं, बल्कि इच्छा है; जब इच्छा ही शेष न रहे, तो जन्म-चक्र भी स्वतः रुक जाता है।

इसके पश्चात् वही मंत्र आता है जो कठ उपनिषद् में भी लगभग शब्दशः मिलता है — "नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥" — यह आत्मा न प्रवचन से, न बुद्धि से, न बहुत सुनने से प्राप्त होता है; जिसे यह स्वयं चुन लेता है, केवल उसे ही यह प्राप्त होता है, और उसके सामने ही यह अपना स्वरूप प्रकट करता है। दोनों उपनिषदों में इस मंत्र की पुनरावृत्ति यह दर्शाती है कि यह सत्य कितना केंद्रीय माना गया — आत्म-ज्ञान अंततः न बौद्धिक उपलब्धि है, न शैक्षणिक योग्यता का फल, बल्कि एक प्रकार की कृपा है, जो साधक के सम्पूर्ण, निष्कपट समर्पण के उत्तर में प्रकट होती है।

उपनिषद् यह भी स्पष्ट करती है कि यह आत्मा उसे प्राप्त नहीं होता जिसमें बल न हो, जो प्रमाद-युक्त हो, या जिसका तप उचित विधि से न किया गया हो; परन्तु जो साधक ज्ञान के माध्यम से प्रयत्नशील रहता है, विवेकपूर्वक इन साधनों का अभ्यास करता है, उसका आत्मा ब्रह्म के धाम में प्रवेश कर जाता है। वहाँ पहुँचकर, ज्ञान से परितृप्त, कृतकृत्य, समस्त वासनाओं से मुक्त, शान्त-चित्त ऋषिजन उस सर्वव्यापी तत्त्व को सर्वत्र प्राप्त कर, युक्तात्मा होकर सर्वात्मरूप में प्रवेश कर जाते हैं।

उपनिषद् का समापन वेदांत-ज्ञान के फल की महिमा और परम्परा की पवित्रता, दोनों पर बल देते हुए होता है — जो साधक वेदांत-ज्ञान के तात्पर्य को भली-भाँति निश्चित कर, संन्यास-योग द्वारा चित्त को शुद्ध कर लेते हैं, वे अंत-काल में ब्रह्म-लोकों में सर्वथा मुक्ति को प्राप्त होकर अमर हो जाते हैं। अंगिरा ऋषि द्वारा प्रदत्त यह सत्य-विद्या यह चेतावनी भी देती है कि यह उसे नहीं सिखाई जानी चाहिए जिसका आचरण शुद्ध न हो, या जिसका कोई पुत्र या शिष्य न हो — यह ज्ञान की पवित्रता और उसके सुयोग्य संरक्षण, दोनों के प्रति उपनिषद् की गहरी चिंता को दर्शाता है। अंत में महान ऋषियों को, और गुरुओं को बारम्बार नमस्कार अर्पित करते हुए यह उपनिषद् समाप्त होती है।

इस अध्याय का सार

आत्मा न प्रवचन से मिलता है, न बुद्धि से, न शास्त्र-ज्ञान से — यह उसी को प्राप्त होता है जिसे यह स्वयं चुन ले; इच्छाओं का पूर्ण शमन ही उस चुनाव की सच्ची पात्रता है।