कृष्ण यजुर्वेद · ६ वल्ली
कठ उपनिषद्
नचिकेता और यमराज का प्रसिद्ध संवाद — श्रेय-प्रेय का विवेक, रथ-रूपक से आत्मा का वर्णन, और अश्वत्थ वृक्ष के रूप में सृष्टि का चित्रण।
तीन वर — नचिकेता और यम का संवाद (अध्याय 1, वल्ली 1)
कठ उपनिषद् की कथा एक साधारण घरेलू दृश्य से आरम्भ होती है। वाजश्रवा नामक ऋषि विश्वजित यज्ञ करते हैं, जिसमें अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति दान करनी होती है। परन्तु वे दान में केवल वे गायें देते हैं जो बूढ़ी, निर्जल-पान-अक्षम, दुर्बल और दूध-रहित हो चुकी हैं। उनका बालक पुत्र नचिकेता, जो अभी श्रद्धा (सच्ची निष्ठा) से भरा हुआ है, इस पाखंड को देखकर व्याकुल हो उठता है और सोचता है कि ऐसा अधूरा दान देने वाला पिता निश्चय ही अपयश के लोकों को प्राप्त करेगा। वह पिता के पास जाकर बार-बार पूछता है — "पिताजी, आप मुझे किसे देंगे?" पिता पहले टाल देते हैं, परन्तु नचिकेता के तीसरी बार पूछने पर, क्रोध में आकर कह उठते हैं — "मृत्यवे त्वा ददामि" — मैं तुझे मृत्यु को देता हूँ।
यह शब्द बोलते ही नचिकेता, अपने पिता के वचन को सत्य मानते हुए, यमराज के धाम की ओर प्रस्थान करता है — यह उसकी सत्यनिष्ठा का प्रमाण है, क्योंकि वह जानता था कि पिता का यह वचन क्रोधवश निकला था, फिर भी वह उसे मिथ्या नहीं होने देना चाहता था। यमराज के घर पहुँचकर वह पाता है कि यमराज उस समय वहाँ उपस्थित नहीं हैं, और उसे तीन रात्रियों तक बिना भोजन-जल और बिना स्वागत के प्रतीक्षा करनी पड़ती है। जब यमराज लौटते हैं, तो उन्हें बताया जाता है कि एक ब्राह्मण अतिथि, अग्नि के समान तेजस्वी, तीन रात्रियों से बिना सत्कार के बैठा है। यमराज तुरन्त समझ जाते हैं कि ब्राह्मण अतिथि का अनादर कितना गम्भीर दोष है, और वे नचिकेता से क्षमा माँगते हुए तीन रात्रियों की क्षतिपूर्ति के रूप में तीन वर माँगने को कहते हैं।
नचिकेता का पहला वर सरल है — "शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो" — हे मृत्यु, मेरे पिता गौतम मेरे प्रति शान्त-चित्त, प्रसन्न-मन और क्रोध-रहित हो जाएँ, मुझे पहचान लें और मेरे घर लौटने पर मुझे स्नेह से स्वीकार करें। यह वर बताता है कि नचिकेता का उद्देश्य पिता के प्रति विद्रोह नहीं था, बल्कि सत्य के प्रति समर्पण था — वह अब भी अपने पिता से प्रेम करता है, और चाहता है कि यह प्रकरण उनके सम्बन्धों में कटुता न लाए। दूसरा वर वह उस अग्नि-विद्या के लिए माँगता है जो स्वर्गलोक की प्राप्ति कराती है — यमराज प्रसन्न होकर उसे यह अग्नि-विद्या सिखाते हैं, और प्रसन्नतावश यह भी वरदान देते हैं कि यह अग्नि आगे "नाचिकेत अग्नि" के नाम से जानी जाएगी।
तीसरे वर पर आकर संवाद अपने चरम पर पहुँचता है — नचिकेता पूछता है, "येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके, एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः॥" — मनुष्य के मरने के पश्चात् यह संशय बना रहता है कि कोई कहते हैं वह विद्यमान रहता है, कोई कहते हैं नहीं रहता — यही मुझे आपसे सीखना है, यही मेरा तीसरा वर है। यमराज स्वयं यह प्रश्न सुनकर विचलित हो उठते हैं और नचिकेता को इससे विरत करने का प्रयत्न करते हैं — वे उसे दीर्घ आयु, पुत्र-पौत्र, पशु-धन, विशाल राज्य, दिव्य संगीत और अप्सराओं तक का प्रलोभन देते हैं, यह कहते हुए कि यह प्रश्न देवताओं के लिए भी दुर्बोध है, इसे मत माँगो।
नचिकेता का उत्तर इस उपनिषद् का हृदय है — वह कहता है कि ये समस्त सांसारिक सुख क्षणभंगुर हैं, वे मनुष्य की इन्द्रिय-शक्ति को ही क्षीण कर देते हैं, और सबसे लम्बा जीवन भी अनन्तता की तुलना में अत्यन्त तुच्छ है — "श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्" — हे मृत्यु, ये सब आपके ही हाथ में हैं, कल का क्या भरोसा। धन से मनुष्य कभी तृप्त नहीं होता, और जिस दुर्लभ ज्ञान की झलक तुमसे मिल रही है, उसे छोड़कर मैं और कुछ कैसे माँग सकता हूँ? नचिकेता के इस अटल विवेक और वैराग्य से प्रसन्न होकर यमराज अंततः उसे यह गूढ़तम ज्ञान सिखाने के लिए सहमत हो जाते हैं — और यहीं से उपनिषद् का वास्तविक दार्शनिक उपदेश आरम्भ होता है।
इस अध्याय का सार
जो श्रेय के मार्ग पर सांसारिक प्रलोभनों से भी विचलित नहीं होता, वही उस दुर्लभ ज्ञान का सच्चा अधिकारी बनता है — नचिकेता का विवेक ही उसकी सबसे बड़ी योग्यता थी।
श्रेय और प्रेय — दो मार्ग (अध्याय 1, वल्ली 2)
यमराज अपना उपदेश एक मौलिक भेद स्थापित करके आरम्भ करते हैं — "अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषꣳ सिनीतः। तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते॥" — श्रेय (कल्याणकारी) एक वस्तु है, प्रेय (सुखद) दूसरी; ये दोनों भिन्न-भिन्न लक्ष्यों की ओर मनुष्य को बाँधते हैं। जो इनमें से श्रेय को चुनता है, उसका कल्याण होता है; जो प्रेय को चुनता है, वह अपने वास्तविक लक्ष्य से भटक जाता है। यह भेद आधुनिक जीवन में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तब था — हर क्षण मनुष्य के सामने यह चुनाव आता है कि जो तत्काल सुखद लगे उसे चुने, या जो दीर्घकालिक कल्याणकारी हो उसे। यमराज नचिकेता की प्रशंसा करते हैं कि उसने प्रेय के समस्त प्रलोभनों को अस्वीकार कर श्रेय को चुना।
इसके पश्चात् यमराज उन लोगों की स्थिति का वर्णन करते हैं जो अविद्या में डूबे हुए हैं परन्तु स्वयं को ज्ञानी समझते हैं — "अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः। दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥" — अविद्या के मध्य में रहते हुए भी जो स्वयं को धीर और पण्डित मानते हैं, वे मूढ़ बार-बार भटकते हुए इधर-उधर घूमते रहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे अंधों का नेतृत्व एक अंधा व्यक्ति करे। यह उपमा अत्यन्त तीक्ष्ण है — बौद्धिक अहंकार, जब वह वास्तविक आत्म-ज्ञान के बिना हो, मनुष्य को उसी भटकाव में और गहरा धकेल देता है, क्योंकि वह अपनी अज्ञानता को स्वीकार करने से ही इनकार कर देता है।
आत्म-तत्त्व की दुर्लभता का वर्णन करते हुए यमराज कहते हैं — "श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः। आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः॥" — यह बहुतों के लिए सुनने में भी दुर्लभ है, और सुनकर भी बहुत-से इसे नहीं समझ पाते; इसका वक्ता आश्चर्यजनक होता है, इसे प्राप्त करने वाला भी कुशल होना चाहिए, और कुशल गुरु द्वारा सिखाया गया शिष्य ही इसका ज्ञाता बन पाता है। यह मंत्र स्पष्ट करता है कि आत्म-ज्ञान केवल पुस्तकीय अध्ययन से नहीं, बल्कि योग्य गुरु और योग्य शिष्य, दोनों के संयोग से ही सम्भव होता है — इसीलिए भारतीय परम्परा में गुरु-शिष्य सम्बन्ध को इतना पवित्र माना गया।
इसी वल्ली में वह प्रसिद्ध आह्वान भी आता है जो आज भी उद्धृत किया जाता है — "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥" — उठो, जागो, श्रेष्ठ गुरुओं के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करो; यह मार्ग छुरे की तीक्ष्ण धार के समान अत्यन्त कठिन और दुर्गम है, ऐसा विद्वान कहते हैं। इसके तुरन्त बाद, जब नचिकेता उस परम लक्ष्य के विषय में पूछता है जो समस्त वेद, समस्त तप और समस्त ब्रह्मचर्य का उद्देश्य है, यमराज एक ही अक्षर में उत्तर देते हैं — "ॐ इत्येतत्" — वह है ॐ। यह पवित्र अक्षर ही ब्रह्म का सबसे सरल, सबसे सघन प्रतीक है, जिसका ध्यान करने वाला जो कुछ भी चाहे, प्राप्त कर लेता है।
इस वल्ली की समाप्ति आत्मा की अजन्मा, नित्य प्रकृति के वर्णन से होती है — "न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥" — यह ज्ञानवान आत्मा न जन्म लेता है, न मरता है; यह किसी से उत्पन्न नहीं हुआ, न इससे कुछ उत्पन्न हुआ; यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है — शरीर के नष्ट होने पर भी यह नष्ट नहीं होता। यह वही श्लोक है जो आगे चलकर भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय में लगभग शब्दशः दोहराया जाता है, जो इस बात का प्रमाण है कि गीता की आत्म-ज्ञान सम्बन्धी शिक्षा की जड़ें सीधे कठ उपनिषद् में हैं।
इस अध्याय का सार
श्रेय और प्रेय के बीच का चुनाव ही मनुष्य के जीवन की दिशा तय करता है — जो तात्कालिक सुख के बजाय दीर्घकालिक कल्याण चुनता है, वही सच्चे ज्ञान का अधिकारी बनता है।
रथ का रूपक (अध्याय 1, वल्ली 3)
इस वल्ली में यमराज एक ऐसा रूपक प्रस्तुत करते हैं जो सम्भवतः सम्पूर्ण भारतीय दर्शन-साहित्य में सबसे अधिक प्रसिद्ध और सबसे अधिक उद्धृत किया गया है — "आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥" — आत्मा को रथ का स्वामी जानो, शरीर को रथ; बुद्धि को सारथी जानो, और मन को लगाम। इन्द्रियों को घोड़े कहा गया है, और इन्द्रियों के विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) को वह मार्ग जिस पर रथ चलता है। आत्मा, इन्द्रियों और मन से युक्त होकर, "भोक्ता" कहलाता है — अर्थात् अनुभवों का भोगने वाला।
इस रूपक की सुंदरता इसकी व्यावहारिकता में है — यह किसी अमूर्त सिद्धान्त के बजाय एक ऐसा चित्र प्रस्तुत करता है जिसे हर कोई समझ सकता है। यमराज आगे कहते हैं — "यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा। तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः॥" — जिस व्यक्ति की बुद्धि अविवेकी है, जिसका मन सदा अनियंत्रित रहता है, उसकी इन्द्रियाँ वैसे ही अवश्य (बेकाबू) हो जाती हैं जैसे किसी कुशल सारथी के भी दुष्ट घोड़े। परन्तु — "यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा। तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः॥" — जिसकी बुद्धि विवेकी है और मन सदा संयत रहता है, उसकी इन्द्रियाँ वैसे ही वशीभूत रहती हैं जैसे किसी कुशल सारथी के सुसंस्कृत, आज्ञाकारी घोड़े।
यह रूपक मनोविज्ञान की दृष्टि से भी अत्यन्त परिष्कृत है — यह जीवन में अनुशासन और स्वतंत्रता के बीच के सम्बन्ध को उजागर करता है। अनियंत्रित इन्द्रियाँ स्वतंत्रता नहीं, बल्कि एक नई प्रकार की दासता हैं — जैसे बेकाबू घोड़े रथ को गड्ढे में गिरा सकते हैं, वैसे ही अनियंत्रित इन्द्रियाँ मनुष्य को विनाश की ओर ले जा सकती हैं। परन्तु जब बुद्धि (सारथी) सजग और कुशल होती है, और मन (लगाम) उसके नियंत्रण में रहता है, तभी इन्द्रियाँ (घोड़े) उचित दिशा में, उचित गति से चल पाती हैं, और रथ (शरीर) अपने गंतव्य — आत्म-साक्षात्कार — तक सुरक्षित पहुँच पाता है।
इस वल्ली का समापन एक पदानुक्रम (hierarchy) के वर्णन से होता है, जो सृष्टि की परतों को इन्द्रियों से लेकर परम पुरुष तक क्रमबद्ध करता है — "इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः॥ महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः। पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः॥" — इन्द्रियों से परे उनके विषय हैं, विषयों से परे मन है, मन से परे बुद्धि है, बुद्धि से परे महान् आत्मा (महत्तत्त्व) है; महत्तत्त्व से परे अव्यक्त (अप्रकट प्रकृति) है, अव्यक्त से परे पुरुष है, और पुरुष से परे कुछ भी नहीं — वही चरम सीमा है, वही परम गति है। यह क्रम बताता है कि आत्म-साक्षात्कार की यात्रा स्थूल से सूक्ष्म की ओर, बाह्य से आंतरिक की ओर, एक-एक परत उघाड़ते हुए आगे बढ़ती है, जब तक साधक उस अंतिम, अविभाज्य तत्त्व तक न पहुँच जाए।
इस अध्याय का सार
जिसकी बुद्धि-रूपी सारथी सजग और मन-रूपी लगाम संयत है, उसकी इन्द्रियाँ-रूपी घोड़े वश में रहते हैं — अनुशासन ही आत्म-साक्षात्कार के रथ को सही गंतव्य तक पहुँचाता है।
अंतर्मुखी दृष्टि (अध्याय 2, वल्ली 1)
द्वितीय अध्याय की पहली वल्ली एक मौलिक प्रश्न से आरम्भ होती है — मनुष्य सदा बाहर की ओर ही क्यों देखता है, भीतर की ओर क्यों नहीं? यमराज उत्तर देते हैं — "पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्। कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्॥" — स्वयम्भू (सृष्टिकर्ता) ने इन्द्रियों के छिद्रों को बाहर की ओर बनाया, इसलिए मनुष्य बाहर की ओर ही देखता है, भीतर आत्मा की ओर नहीं; परन्तु कोई विरला धीर पुरुष, अमरत्व की इच्छा से, अपनी दृष्टि को भीतर की ओर मोड़कर प्रत्यक् आत्मा (भीतर के आत्मा) को देखता है। यह मंत्र मानव-स्वभाव के एक गहन सत्य को उजागर करता है — हमारी संरचना ही ऐसी है कि हम स्वाभाविक रूप से बाह्य वस्तुओं, सुखों और उपलब्धियों की ओर आकर्षित होते हैं; अंतर्मुखी होना कोई स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि एक सचेत, साहसिक प्रयास है, जो केवल कुछ विरले साधक ही कर पाते हैं।
आगे यमराज उन लोगों की सीमाओं को स्पष्ट करते हैं जो अभी इस मार्ग के लिए तैयार नहीं हैं — "नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्॥" — जो दुराचार से विरत नहीं हुआ, जो अशान्त है, जो असमाहित-चित्त है, जिसका मन शान्त नहीं है, वह केवल बौद्धिक ज्ञान से भी इस आत्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। यह स्पष्ट करता है कि आत्म-ज्ञान केवल दार्शनिक बहस या शास्त्र-अध्ययन का विषय नहीं — इसके लिए नैतिक शुद्धता, मानसिक शान्ति और आत्म-संयम की एक ठोस नींव आवश्यक है। बिना इस नींव के, चाहे कोई कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो, वह इस सूक्ष्म सत्य तक नहीं पहुँच सकता।
इस वल्ली में एक और अत्यन्त गहन मंत्र आता है, जो आत्मा की अगम्यता पर बल देता है — "नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥" — यह आत्मा न प्रवचन से प्राप्त होता है, न बुद्धि से, न बहुत सुनने से; जिसे यह स्वयं चुन लेता है, उसी को यह प्राप्त होता है, उसी के सामने यह अपना स्वरूप प्रकट करता है। यह मंत्र मानवीय प्रयास और दैवी अनुग्रह के बीच के सूक्ष्म सम्बन्ध को दर्शाता है — साधना आवश्यक है, परन्तु अंतिम साक्षात्कार एक ऐसी घटना है जो साधक के प्रयास से परे, मानो स्वयं सत्य की ओर से आती हुई कृपा के रूप में घटित होती है। यही सिद्धान्त आगे मुण्डक उपनिषद् में भी लगभग शब्दशः दोहराया जाएगा, जो दोनों ग्रन्थों के बीच के गहरे सम्बन्ध को दर्शाता है।
इस वल्ली का समापन उन लोगों की दुर्दशा के वर्णन से होता है जो शरीर को ही अंतिम सत्य मान बैठते हैं — जो व्यक्ति यह सोचकर संतुष्ट हो जाता है कि यह भौतिक शरीर ही सब कुछ है, वह बार-बार मृत्यु के वश में आता रहता है, क्योंकि वह उस अमर तत्त्व को कभी नहीं पहचान पाता जो शरीर से परे है। इसके विपरीत, जो साधक धैर्यपूर्वक भीतर की खोज जारी रखता है, नैतिक जीवन जीता है, और मन को शान्त करता है, वह क्रमशः उस आत्मा के निकट पहुँचता जाता है, जब तक कि अंततः वह आत्मा स्वयं उसके सामने अपना स्वरूप प्रकट नहीं कर देता।
इस अध्याय का सार
आत्मा को न प्रवचन से पाया जा सकता है, न बुद्धि से, न शास्त्र-श्रवण से — केवल शुद्ध, शान्त-चित्त साधक के सामने ही वह स्वयं अपना स्वरूप प्रकट करता है।
सूर्य के समान आत्मा (अध्याय 2, वल्ली 2)
दूसरी वल्ली में यमराज आत्मा और सूर्य के बीच एक गहन उपमा प्रस्तुत करते हैं, जो आगे चलकर ईशावास्य उपनिषद् में भी प्रतिध्वनित होगी। जिस प्रकार सूर्य सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करता है परन्तु स्वयं किसी आँख के दोष या किसी वस्तु की अशुद्धता से कलंकित नहीं होता, उसी प्रकार वह एक आत्मा जो प्रत्येक प्राणी के भीतर विद्यमान है, संसार के सुख-दुःखों का अनुभव कराते हुए भी स्वयं उनसे अस्पृष्ट रहती है। यह उपमा उस भ्रान्ति को दूर करती है जो सोचती है कि यदि ईश्वर सर्वव्यापी है तो वह संसार के दुःखों से भी बँधा होगा — जैसे सूर्य कीचड़ में प्रतिबिम्बित होकर भी कीचड़ से मलिन नहीं होता, वैसे ही आत्मा संसार में व्याप्त होकर भी संसार के दोषों से अछूती रहती है।
यमराज एक और महत्वपूर्ण सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं — "एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषाꣳ सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥" — वह एक, सबका नियन्ता, समस्त प्राणियों के भीतर स्थित आत्मा, जो अपने एक ही रूप को अनेक रूपों में प्रकट करता है — जो धीर पुरुष उसे अपने भीतर स्थित देखते हैं, उन्हीं को शाश्वत सुख प्राप्त होता है, अन्य किसी को नहीं। यह मंत्र अद्वैत वेदान्त के मूल सिद्धान्त को स्पष्ट करता है — विविधता केवल सतह पर है, गहराई में एक ही चेतना समस्त रूपों में व्याप्त है, और सच्चा सुख इस एकत्व को पहचानने में है, न कि बाह्य विविधता में उलझे रहने में।
इसी क्रम में एक और अत्यन्त प्रसिद्ध मंत्र आता है — "नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषाꣳ शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्॥" — जो अनित्य वस्तुओं में नित्य है, चेतनों में चेतन है, जो एक होते हुए भी अनेकों की इच्छाओं को पूर्ण करता है — जो धीर पुरुष उसे अपने भीतर देखते हैं, उन्हें ही शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है। यहाँ ध्यान देने योग्य है कि यह "कामनाओं को पूर्ण करने वाला" ईश्वर किसी बाह्य वरदाता के रूप में नहीं, बल्कि साधक के अपने भीतर स्थित तत्त्व के रूप में वर्णित है — वास्तविक तृप्ति बाहर से मिलने वाली वस्तुओं में नहीं, बल्कि भीतर के इस नित्य चेतन तत्त्व की पहचान में है।
इस वल्ली का समापन इस प्रश्न से होता है कि क्या इस आत्मा को शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है — यमराज कहते हैं कि जैसे यह "अणोरणीयान् महतो महीयान्" (अणु से भी सूक्ष्म, महान से भी महान) है, इसे केवल तर्क से नहीं, बल्कि प्रसाद (कृपा) से, आत्मा की निर्मलता से ही अनुभव किया जा सकता है। यह उपनिषद् बार-बार इस बात पर बल देती है कि परम सत्य तर्क और वाद-विवाद की सीमाओं से परे है — यह न तो केवल एक बौद्धिक सिद्धान्त है, न ही केवल एक भावनात्मक अनुभूति, बल्कि दोनों से परे, एक ऐसी प्रत्यक्ष अनुभूति है जो शुद्ध, शान्त और एकाग्र चित्त में ही प्रकट होती है।
इस अध्याय का सार
जैसे सूर्य संसार को प्रकाशित करते हुए भी उसके दोषों से अलिप्त रहता है, वैसे ही आत्मा सबमें व्याप्त होकर भी सबसे परे और शुद्ध रहती है — इसे पहचानने वाले को ही शाश्वत सुख और शान्ति मिलती है।
अश्वत्थ वृक्ष और अंगुष्ठमात्र पुरुष (अध्याय 2, वल्ली 3)
उपनिषद् की अंतिम वल्ली एक विस्मयकारी रूपक से आरम्भ होती है — "ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः। तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते॥" — यह सनातन अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष अपनी जड़ों को ऊपर की ओर और शाखाओं को नीचे की ओर फैलाए हुए है; वही शुद्ध है, वही ब्रह्म है, वही अमृत कहलाता है; समस्त लोक उसी में प्रतिष्ठित हैं, कोई भी उससे आगे नहीं जाता। यह उल्टा वृक्ष एक विलक्षण प्रतीक है — सामान्य वृक्षों के विपरीत, जिनकी जड़ें पृथ्वी में और शाखाएँ आकाश में होती हैं, यह वृक्ष दर्शाता है कि सृष्टि का मूल स्रोत (जड़ें) ब्रह्म में, ऊपर, अदृश्य क्षेत्र में है, जबकि हम जिस दृश्य संसार को शाखाओं-पत्तों के रूप में अनुभव करते हैं, वह वास्तव में उस अदृश्य मूल की ही अभिव्यक्ति है।
इसके पश्चात् उपनिषद् मनुष्य के शरीर की आंतरिक संरचना का वर्णन करती है — हृदय से सौ से अधिक नाड़ियाँ (नसें) निकलती हैं, जिनमें से एक, सुषुम्ना नामक नाड़ी, सिर के मुकुट (ब्रह्मरन्ध्र) की ओर जाती है। मृत्यु के समय यदि प्राण इसी नाड़ी से होकर ऊपर जाता है, तो साधक अमरत्व को प्राप्त होता है; शेष नाड़ियाँ प्राणी को विभिन्न लोकों और पुनर्जन्मों की ओर ले जाती हैं, उसके संचित कर्मों के अनुसार। इसी सन्दर्भ में वह प्रसिद्ध मंत्र आता है — "अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति" — अंगूठे के आकार का पुरुष शरीर के मध्य में, हृदय-प्रदेश में स्थित रहता है; उसे धैर्यपूर्वक, स्पष्ट रूप से पहचानना चाहिए, क्योंकि यही अमरत्व का स्रोत है।
यमराज साधना की एक क्रमिक विधि भी बताते हैं — वाणी को मन में, मन को बुद्धि में, बुद्धि को महत् (कॉस्मिक बुद्धि) में, और महत् को शान्त आत्मा में विलीन करने का अभ्यास। यह ठीक वैसी ही प्रक्रिया है जैसे किसी बर्तन में रखे जल को क्रमशः शुद्ध करते जाना, जब तक वह अपनी मूल निर्मलता तक न पहुँच जाए। यह साधना-क्रम बाद के योग-दर्शन में और भी विस्तृत रूप से विकसित हुआ, परन्तु इसका मूल बीज यहीं, कठ उपनिषद् में, स्पष्ट रूप से रखा गया है — बाह्य से आंतरिक की ओर, स्थूल से सूक्ष्म की ओर, चरण-दर-चरण वापसी।
उपनिषद् का समापन पुनः उसी आह्वान से होता है जो पहली वल्ली में आया था — "उत्तिष्ठत जाग्रत" — उठो, जागो — परन्तु अब यह आह्वान अधिक गहन अर्थ ले चुका है, क्योंकि अब श्रोता जान चुका है कि यह जागरण किस ओर होना है। अंतिम मंत्र घोषणा करता है — जो यह नचिकेता-कथा और यह विद्या सीखकर धारण करता है, वह ब्रह्म-लोक में विभूषित होता है। इस प्रकार कठ उपनिषद् एक बालक की सरल जिज्ञासा से आरम्भ होकर, मृत्यु के देवता के मुख से, मानव-चेतना के सबसे गहन रहस्यों — आत्मा, ब्रह्म, मृत्यु के पार का जीवन, और मुक्ति के मार्ग — तक की यात्रा पूर्ण करती है।
इस अध्याय का सार
जो सुषुम्ना-मार्ग से, अर्थात् आत्म-ज्ञान के सीधे मार्ग से, अंगुष्ठमात्र पुरुष को हृदय में पहचान लेता है, वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होकर अमरत्व को प्राप्त होता है।
