शुक्ल यजुर्वेद · १८ मंत्र

ईशावास्य उपनिषद्

त्याग-पूर्वक भोग, कर्म और ज्ञान का समन्वय, तथा एक मरणासन्न साधक की सूर्य व अग्नि से मार्मिक प्रार्थना — सबसे संक्षिप्त किन्तु सबसे सघन उपनिषद्।

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त्याग और कर्म का मार्ग (मंत्र 1–3)

ईशावास्य उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयि संहिता के चालीसवें अध्याय के रूप में आता है, और यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय परम्परा ने कर्मकाण्ड (यज्ञ-विधियों) के ग्रन्थ के भीतर ही उसका चरम ज्ञान-सूत्र भी रख दिया — मानो यह कहते हुए कि कर्म की पूर्णता ज्ञान में ही है। इसी कारण महात्मा गांधी ने कहा था कि यदि समस्त उपनिषद् और शेष सारा हिन्दू शास्त्र-भण्डार भस्म हो जाए और केवल ईशावास्य उपनिषद् का प्रथम मंत्र शेष रह जाए, तो हिन्दुत्व सदा के लिए जीवित रहेगा। यह उद्घोष है — "ॐ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥" — इस चराचर जगत् में जो कुछ भी है, चलता हो या अचल, वह सब-का-सब उस ईश्वर से आवासित है, उसी में लिपटा हुआ है। यह कोई निषेधात्मक वैराग्य-वाद नहीं, बल्कि एक भरा-पूरा, सकारात्मक दर्शन है: संसार मिथ्या या त्याज्य नहीं, वह स्वयं परमात्मा का वस्त्र है, उसी की अभिव्यक्ति है।

इसी मंत्र का उत्तरार्ध कहता है — "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा, मा गृधः कस्यस्विद्धनम्" — त्याग-पूर्वक भोग करो, किसी के भी धन की लालसा मत रखो। यहाँ ध्यान देने योग्य है कि ऋषि "भोग मत करो" नहीं कहते, बल्कि "त्याग-पूर्वक भोग करो" कहते हैं — भोग स्वयं निषिद्ध नहीं है, केवल उसमें छिपा स्वामित्व-भाव, वह भावना कि "यह मेरा है, इसे मैं भोगने का अधिकारी हूँ" निषिद्ध है। जब साधक यह समझ लेता है कि सम्पूर्ण सृष्टि ईश्वर की है और वह स्वयं उसका एक न्यासी (ट्रस्टी) मात्र है, तो भोग बंधन नहीं रह जाता, बल्कि पूजा का ही एक रूप बन जाता है। यही सिद्धान्त आगे चलकर भगवद्गीता में "निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्" के रूप में और भी विस्तार पाता है।

दूसरा मंत्र इस त्याग को पलायनवाद बनने से बचा लेता है — "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥" — मनुष्य को चाहिए कि वह इसी संसार में कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की इच्छा रखे; इसके अतिरिक्त मनुष्य के लिए ऐसा कोई मार्ग नहीं है जिसमें कर्म आत्मा को बाँधे नहीं। यह पंक्ति बड़ी साहसिक है — क्योंकि उस युग में भी संन्यास और गृहस्थ जीवन के बीच बहस चलती थी, और यहाँ ऋषि स्पष्ट पक्ष लेते हैं: कर्म से भागकर मुक्ति नहीं मिलती, कर्म को सही दृष्टि से करने में ही मुक्ति छिपी है। जो व्यक्ति फल की आसक्ति और कर्तापन के अहंकार के बिना कार्य करता है, कर्म उसे बाँधता नहीं — ठीक वैसे ही जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी उससे भीगता नहीं, या जैसे सूर्य समस्त संसार को प्रकाशित करते हुए भी किसी भी वस्तु के दोष से लिप्त नहीं होता।

तीसरा मंत्र एक गम्भीर चेतावनी में उतरता है — "असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः। ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥" — जो लोग आत्मा का हनन करते हैं, अर्थात् जो अपने भीतर की चेतना को नकारकर केवल भौतिक जीवन में डूबे रहते हैं, वे मृत्यु के पश्चात् "असुर्य" नामक लोकों में जाते हैं, जो घने अंधकार से घिरे हैं। यह कोई पौराणिक भय-कथा नहीं, बल्कि एक गहरा मनोवैज्ञानिक सत्य है — जो जीवन आत्म-विस्मृति में, केवल संग्रह और उपभोग में बीतता है, वह स्वयं ही एक भीतरी शून्यता और अंधकार बन जाता है, चाहे बाहर से वह व्यक्ति कितना भी सफल, समृद्ध और सम्मानित क्यों न दिखे। आत्महत्या यहाँ शरीर की नहीं, बल्कि आत्म-चेतना की, आत्म-बोध की हत्या है — स्वयं को केवल शरीर और इन्द्रियों तक सीमित मान लेना ही सबसे बड़ा आत्म-हनन है।

इन तीन मंत्रों को एक साथ पढ़ने पर उपनिषद् की सम्पूर्ण जीवन-दृष्टि उभरकर सामने आती है: संसार को ईश्वर का आवास मानो (मंत्र १), उसमें त्याग-भाव से रहते हुए कर्म करो (मंत्र २), और कर्म से भागकर आत्म-विस्मृति में मत खो जाओ (मंत्र ३)। यह न तो शुद्ध भौतिकतावाद की स्वीकृति है, न शुद्ध संन्यास की माँग — यह एक तीसरा, अधिक कठिन और अधिक परिपक्व मार्ग है, जिसमें साधक संसार में पूरी तरह सक्रिय रहते हुए भी भीतर से मुक्त रहता है। यही कारण है कि यह उपनिषद् गृहस्थ और साधक, दोनों के लिए समान रूप से प्रासंगिक मानी जाती है — यह किसी गुफा में बैठने की नहीं, बल्कि जीवन के मध्य में खड़े रहकर मुक्त होने की शिक्षा देती है।

इस अध्याय का सार

संसार को त्यागना नहीं, संसार में ममता को त्यागना ही सच्चा वैराग्य है — कर्म से पलायन मुक्ति नहीं, आसक्ति-रहित कर्म ही मुक्ति का मार्ग है।

2

आत्मा का अद्भुत स्वरूप (मंत्र 4–8)

अब उपनिषद् की दृष्टि बाहरी कर्म से हटकर उस तत्त्व की ओर मुड़ती है जो कर्म के पीछे साक्षी रूप में सदा विद्यमान है — आत्मा। चौथा मंत्र इसका वर्णन विरोधाभासों की भाषा में करता है — "अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत्। तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥" — वह एक है, अचल है, फिर भी मन से भी अधिक वेगवान है; देवता भी उस तक दौड़कर नहीं पहुँच सके, क्योंकि वह पहले से ही वहाँ विद्यमान था। वह स्थिर रहते हुए भी दौड़ने वालों को पीछे छोड़ देता है, और उसी में वायु (मातरिश्वा) जल-तत्त्व को धारण करता है। यह विरोधाभास बुद्धि को चौंकाने के लिए है — क्योंकि सामान्य तर्क में जो अचल है वह गतिमान नहीं हो सकता, परन्तु आत्मा समय और स्थान की उन सीमाओं से ही परे है जिनमें गति और स्थिरता का भेद अर्थ रखता है।

पाँचवाँ मंत्र इस विरोधाभास को और भी गहरा कर देता है — "तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥" — वह चलता भी है, नहीं भी चलता; वह दूर भी है, अत्यन्त निकट भी है; वह इस सबके भीतर भी है, और इस सबसे बाहर भी। बुद्धि जब भी आत्मा को किसी एक कोटि में बाँधने का प्रयत्न करती है — गतिमान या स्थिर, सीमित या असीम, आंतरिक या बाह्य — वह असफल हो जाती है, क्योंकि आत्मा स्वयं इन द्वंद्वों की सृष्टि करने वाला तत्त्व है, इसलिए वह स्वयं किसी द्वंद्व में बँध नहीं सकता। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई चित्रकार अपने ही बनाए चित्र की सीमाओं में समा नहीं सकता — वह सदा उस चित्र से बड़ा, उससे परे होता है।

छठा और सातवाँ मंत्र इस दार्शनिक सत्य का अत्यन्त व्यावहारिक परिणाम बताते हैं — "यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥" — जो साधक सभी प्राणियों को अपनी ही आत्मा में और अपनी आत्मा को सभी प्राणियों में देखता है, उसके भीतर से घृणा सदा के लिए तिरोहित हो जाती है, क्योंकि घृणा तो सदा किसी "अन्य" के प्रति होती है, और जब अन्यत्व का बोध ही समाप्त हो जाए तो द्वेष किसके प्रति रहे? सातवाँ मंत्र इसे और आगे बढ़ाता है — "यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥" — जिसने सबमें एकत्व देख लिया, जिसके लिए समस्त प्राणी उसकी अपनी ही आत्मा बन गए हों, उसके लिए शोक किसका और मोह किसका? यह वही अनुभूति है जो एक माँ को अपने बच्चे के प्रति सहज ही होती है — जब बच्चे को कष्ट होता है तो माँ को यह "अन्य किसी" का दुःख नहीं लगता, बल्कि अपना ही दुःख लगता है, क्योंकि ममता ने भेद को पहले ही मिटा दिया है। उपनिषद् इसी अनुभूति को समस्त सृष्टि तक विस्तृत करने के लिए कहती है।

आठवाँ मंत्र आत्मा के इस सर्वव्यापी, सर्वज्ञ स्वरूप का एक भव्य, सघन चित्रण करता है — "स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥" — वह सर्वत्र व्याप्त है, तेजस्वी, शरीर-रहित, अक्षत, बिना नाड़ी-तंतुओं वाला, शुद्ध और पाप-रहित है; वह कवि (सब कुछ देखने वाला द्रष्टा), मनीषी (मनन करने वाला), परिभू (सबसे परे स्थित) और स्वयम्भू (स्वयं से उत्पन्न) है, जिसने अनादिकाल से सभी वस्तुओं को उनके यथार्थ स्वरूप में, शाश्वत वर्षों के लिए व्यवस्थित किया है। यह मंत्र आत्मा को किसी अमूर्त दार्शनिक सिद्धान्त से उठाकर एक जीवंत, चेतन, सर्वव्यापी उपस्थिति के रूप में प्रतिष्ठित कर देता है — वह दूर के किसी स्वर्ग में बैठा शासक नहीं, बल्कि स्वयं हमारे अस्तित्व का मूल आधार है।

इन पाँच मंत्रों की समग्र शिक्षा यह है कि आत्म-ज्ञान कोई बौद्धिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक अनुभूति-परिवर्तन है — भेद-दृष्टि से एकत्व-दृष्टि की ओर यात्रा। जब तक "मैं" और "अन्य" के बीच की दीवार खड़ी रहती है, तब तक भय, शोक, ईर्ष्या और घृणा अनिवार्य रूप से बने रहते हैं, क्योंकि ये सभी भाव किसी "दूसरे" के अस्तित्व को मानकर ही उत्पन्न होते हैं। उपनिषद् की क्रांतिकारी घोषणा यह है कि यह दीवार वास्तविक नहीं, केवल अज्ञान-जनित है — और जिस क्षण साधक इस एकत्व को साक्षात् अनुभव करता है, उसी क्षण वह सहज ही निर्भय, शोक-रहित और करुणा से पूर्ण हो जाता है।

इस अध्याय का सार

जिसने सब प्राणियों में अपने ही आत्मा को देख लिया, उसके लिए न कोई भय शेष रहता है, न शोक, न मोह — भेद-दृष्टि के मिटते ही द्वेष अपने आप विलीन हो जाता है।

3

विद्या और अविद्या का समन्वय (मंत्र 9–14)

इस भाग में उपनिषद् एक ऐसी समस्या को छूता है जो हर साधक के सामने कभी-न-कभी आती है — लौकिक ज्ञान (कर्मकाण्ड, विज्ञान, व्यवहार-कुशलता) और पारमार्थिक ज्ञान (आत्म-साक्षात्कार) में से किसे चुना जाए? नौवाँ मंत्र चौंकाने वाली स्पष्टता से कहता है — "अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳ रताः॥" — जो केवल अविद्या (कर्मकाण्ड और भौतिक ज्ञान) की उपासना करते हैं, वे अंधकार में प्रवेश करते हैं; परन्तु जो केवल विद्या (शुद्ध आत्म-ज्ञान) में ही रत रहकर कर्म का सर्वथा त्याग कर देते हैं, वे तो मानो उससे भी घने अंधकार में चले जाते हैं। दसवाँ मंत्र इसे दोहराते हुए कहता है कि विद्या और अविद्या का फल भिन्न-भिन्न है — यह सुनकर हमें ऐसा लग सकता है कि उपनिषद् किसी असमाधेय दुविधा में उलझा रहा है, परन्तु अगला ही मंत्र इसका समाधान प्रस्तुत करता है।

ग्यारहवाँ मंत्र वह कुंजी है जिस पर सम्पूर्ण उपनिषद् का दार्शनिक भवन टिका है — "विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयꣳ सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते॥" — जो व्यक्ति विद्या और अविद्या, दोनों को एक साथ, समन्वित रूप से जानता है, वह अविद्या (कर्म-मार्ग, लौकिक ज्ञान) के द्वारा मृत्यु को पार करता है, और विद्या (आत्म-ज्ञान) के द्वारा अमृतत्व को प्राप्त करता है। यहाँ "अविद्या" का अर्थ अज्ञान नहीं, बल्कि कर्मकाण्ड और सांसारिक व्यवहार का ज्ञान है, जो जीवन को मृत्यु के भय और असंतुलन से बचाता है, जबकि "विद्या" वह आत्म-ज्ञान है जो अमरत्व की ओर ले जाता है। यह उपनिषद् की सबसे मौलिक देन है — सांसारिक कर्तव्य और आध्यात्मिक साधना को परस्पर-विरोधी नहीं, अपितु एक ही यात्रा के दो आवश्यक चरणों के रूप में देखने की दृष्टि, जो न तो शुष्क बुद्धिवाद में गिरती है, न अंधश्रद्धा के कर्मकाण्ड में।

बारहवें से चौदहवें मंत्र इसी समन्वय-सिद्धान्त को "सम्भूति" (सृष्टि, कार्य-ब्रह्म, व्यक्त रूप) और "असम्भूति" (अकारण, अव्यक्त, निराकार ब्रह्म) की भाषा में दोहराते हैं — "अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याꣳ रताः॥" — जो केवल असम्भूति (निराकार, अभिव्यक्ति-रहित ब्रह्म) की उपासना करते हैं वे भी अंधकार में जाते हैं, और जो केवल सम्भूति (साकार, सृष्टि, व्यक्त जगत्) में रत रहते हैं वे भी अंधकार में ही रहते हैं। चौदहवाँ मंत्र फिर वही समाधान दोहराता है — दोनों को एक साथ जानने वाला ही, सम्भूति के द्वारा मृत्यु को पार कर, असम्भूति (अ-सम्भूति) के द्वारा अमृतत्व का आस्वादन करता है। यह उपनिषद् की अद्वितीय मध्यम-मार्गी दृष्टि है, जो न शुद्ध निर्गुण-उपासना में अटकती है, न शुद्ध सगुण-कर्मकाण्ड में — वह दोनों को जीवन के दो पूरक, अविभाज्य आयाम मानती है, ठीक वैसे ही जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं।

इस समन्वय-दृष्टि का व्यावहारिक अर्थ आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था। जो व्यक्ति केवल सांसारिक सफलता, धन, कर्तव्य-पालन में उलझा रहता है और भीतर की खोज को कभी स्थान नहीं देता, वह एक प्रकार के अंधकार में जीता है — जीवन की गहनतम गुत्थियाँ उसके लिए अनसुलझी ही रह जाती हैं। परन्तु जो व्यक्ति संसार से पूर्णतः विमुख होकर, अपने कर्तव्यों को त्यागकर, केवल आत्म-चिन्तन में डूब जाता है और परिवार, समाज, कर्तव्य की उपेक्षा करता है, वह भी एक भिन्न प्रकार के अंधकार में — पलायन और अहंकार के अंधकार में — जा गिरता है। उपनिषद् की शिक्षा है कि सच्चा साधक इन दोनों को साथ लेकर चलता है — वह जगत् में पूरी निष्ठा से कर्म करता है, और साथ ही, उस कर्म के भीतर से आत्म-ज्ञान की खोज भी करता रहता है।

यह दृष्टि आगे चलकर भगवद्गीता के कर्मयोग और ज्ञानयोग के समन्वय में और भी विस्तृत रूप में प्रकट होती है, और यही कारण है कि ईशावास्य उपनिषद् को अनेक विद्वान गीता का बीज-रूप मानते हैं। शंकराचार्य ने अपने भाष्य में इसे इस प्रकार समझाया कि विद्या और अविद्या का यह समन्वय क्रमिक साधना-मार्ग का सूचक है — पहले कर्म से चित्त-शुद्धि होती है, और शुद्ध चित्त में ही आत्म-ज्ञान का उदय सम्भव होता है। इस प्रकार अविद्या (कर्म) विद्या (ज्ञान) की शत्रु नहीं, बल्कि उसकी सीढ़ी है।

इस अध्याय का सार

विद्या और अविद्या, ज्ञान और कर्म — दोनों में से किसी एक का त्याग नहीं, अपितु दोनों का समन्वित बोध ही मनुष्य को मृत्यु से परे अमृतत्व तक ले जाता है।

4

अंतिम प्रार्थना — सूर्य और अग्नि से (मंत्र 15–18)

उपनिषद् का समापन एक मरणासन्न साधक की अत्यन्त मार्मिक, व्यक्तिगत प्रार्थना से होता है, जो परम्परा के अनुसार अंत्येष्टि-संस्कार के समय भी पढ़ी जाती है — मानो ज्ञान का यह भव्य दार्शनिक भवन अंततः एक साधारण मनुष्य की, मृत्यु के सम्मुख खड़ी आत्मा की, विनम्र पुकार में उतर आता है। पंद्रहवाँ मंत्र सूर्य को संबोधित है — "हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥" — हे सूर्यदेव, सत्य का मुख एक स्वर्णिम, चमकीली आभा से ढका हुआ है; हे पूषन् (पोषण करने वाले सूर्य), उस पात्र को हटा दीजिए, ताकि जो सत्यधर्मा हूँ मैं, उस सत्य को प्रत्यक्ष देख सकूँ। यह अत्यन्त सूक्ष्म बिम्ब है — परम सत्य कहीं दूर, किसी गुप्त स्थान में छिपा हुआ नहीं है, बल्कि उसकी अपनी ही चमक, उसका अपना तेज, साधारण मानव-दृष्टि के लिए एक आवरण बन जाती है। साधक किसी नए सत्य को पाने की नहीं, बल्कि उस आवरण को हटाने की प्रार्थना करता है — यह ज्ञान-मार्ग की गहनतम विनम्रता है।

सोलहवाँ मंत्र सूर्य के भीतर स्थित उस पुरुष का आवाहन करता है जो साधक स्वयं भी है — "पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह तेजः। यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि॥" — हे पूषन्, हे एकाकी ऋषि, हे यम (नियन्ता), हे सूर्य, हे प्रजापति-पुत्र, अपनी किरणों को समेट लीजिए, अपने तेज को संकुचित कर लीजिए, ताकि मैं आपका वह अत्यन्त कल्याणकारी रूप देख सकूँ — और फिर परम पहचान का उद्घोष होता है: "योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि" — जो वह पुरुष सूर्यमंडल में विराजमान है, वही मैं हूँ। यह उपनिषद् का चरम बिंदु है, जहाँ बाह्य उपासना अचानक आंतरिक साक्षात्कार में परिणत हो जाती है — सूर्य को देखने वाला साधक और सूर्य में स्थित चैतन्य, दोनों अंततः एक ही सिद्ध होते हैं। यही तत्त्व आगे बृहदारण्यक उपनिषद् में "अहं ब्रह्मास्मि" के रूप में और भी स्पष्टता से प्रकट होगा।

सत्रहवाँ मंत्र मृत्यु की घड़ी की पूर्ण गंभीरता को बिना किसी भय के स्वीकार करता है — "वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तꣳ शरीरम्। ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर॥" — प्राण उस अमर वायु में विलीन हो जाए, यह शरीर तो अंततः भस्म होकर ही रह जाएगा; और मन को संबोधित करते हुए कहता है — "हे मन, स्मरण कर, अपने किए हुए कर्मों का स्मरण कर" — यह पंक्ति दो बार दोहराई जाती है, मानो मृत्यु की अंतिम घड़ी में भी सजगता, स्मृति और आत्म-बोध न छूटे, यही सर्वोपरि प्रार्थना हो। यह वही सिद्धान्त है जिसे भगवद्गीता में "अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्" कहा गया — अंतिम क्षण की स्मृति ही आगे की गति निर्धारित करती है, इसलिए साधना का उद्देश्य यह है कि जीवन-भर का अभ्यास अंतिम श्वास तक स्मृति बनाए रखने में सहायक हो।

अंतिम मंत्र अग्निदेव को संबोधित है — "अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम॥" — हे अग्नि, आप हमें सन्मार्ग से ऐश्वर्य (परम कल्याण) की ओर ले चलिए; हे देव, आप हमारे सारे कर्मों को जानते हैं; हमारे कुटिल, टेढ़े पाप को हमसे दूर कीजिए; हम आपको बार-बार, अत्यधिक नमस्कार अर्पित करते हैं। अग्नि यहाँ केवल यज्ञ की भौतिक अग्नि नहीं, बल्कि वह आंतरिक विवेक-अग्नि भी है जो साधक के मार्ग को आलोकित करती है और भटकाव से बचाती है। इस प्रकार उपनिषद् जिस भव्य, अमूर्त दार्शनिक ऊँचाई से आरम्भ हुआ था — "ईशावास्यमिदं सर्वं" — वहाँ से उतरकर एक साधारण, विनम्र, मानवीय प्रार्थना पर समाप्त होता है। यह क्रम स्वयं एक शिक्षा है: सबसे गूढ़ ज्ञान भी अंततः विनय, शरणागति और सजगता में ही अपनी सच्ची पूर्णता पाता है — ज्ञान अहंकार की वृद्धि के लिए नहीं, बल्कि हृदय की विनम्रता के लिए है।

इस प्रकार अठारह छोटे-छोटे मंत्रों में ईशावास्य उपनिषद् जीवन, कर्म, आत्म-ज्ञान, संसार और मृत्यु — सबको एक ही सूत्र में बाँध देता है: सब कुछ ईश्वर से आवासित है, इसलिए त्याग-भाव से कर्म करो; कर्म और ज्ञान दोनों को साथ लेकर चलो; और अंतिम क्षण में भी स्मृति और सत्य के प्रकाश की ही प्रार्थना करो। यही कारण है कि यह उपनिषद्, दस मुख्य उपनिषदों में सबसे छोटी होते हुए भी, सबसे अधिक उद्धृत और सबसे अधिक प्रिय मानी जाती है — यह वेदान्त के सम्पूर्ण दर्शन का, मानो, एक बीज-मंत्र है।

इस अध्याय का सार

सत्य कहीं दूर नहीं, वह अपने ही तेज से ढका है — साधक की अंतिम प्रार्थना यही है कि उस आवरण के हट जाने पर वह पहचान सके: "सो sहम् अस्मि" — वह पुरुष मैं ही हूँ।