सामवेद · ८ अध्याय
छान्दोग्य उपनिषद्
सत्यकाम जाबाल, पंचाग्नि विद्या, उद्दालक-श्वेतकेतु संवाद में "तत्त्वमसि" का उद्घोष, तथा नारद-सनत्कुमार संवाद — भूमा विद्या तक।
उद्गीथ-उपासना और प्राण की विजय (अध्याय 1)
छान्दोग्य उपनिषद्, सामवेद से सम्बद्ध, आठ अध्यायों में विभक्त सबसे विशाल उपनिषदों में से एक है, और इसका आरम्भ ॐ (उद्गीथ) की उपासना से होता है — सामगान में उद्गाता पुरोहित जिस पवित्र स्वर से गान आरम्भ करता है, उसी ॐ को "रसानां रसतमः" — रसों का भी परम रस — कहा गया है। वाणी ऋचा का सार है, ऋचा साम का सार है, और साम में भी उद्गीथ (ॐ स्वर) उसका सार है — इस प्रकार क्रमशः स्थूल से सूक्ष्मतर सार की ओर बढ़ते हुए उपनिषद् दिखाती है कि ॐ ही समस्त वैदिक ज्ञान का अंतिम सार-तत्त्व है।
इसके पश्चात् एक जीवंत कथा आती है — देवताओं और असुरों के बीच युद्ध में, देवताओं ने सोचा कि वे उद्गीथ-गान के द्वारा असुरों पर विजय प्राप्त करेंगे। उन्होंने बारी-बारी से वाणी, प्राण (श्वास), नेत्र, कर्ण और मन को उद्गाता बनाया, परन्तु असुरों ने प्रत्येक को पाप से बींध दिया — वाणी झूठ बोलने लगी, नेत्र बुरा देखने लगे, कान बुरा सुनने लगे, मन बुरा सोचने लगा। अंततः जब मुख्य प्राण को उद्गाता बनाया गया, असुर उससे टकराकर वैसे ही चूर-चूर हो गए जैसे मिट्टी का ढेला किसी ठोस चट्टान से टकराकर बिखर जाता है — इसलिए प्राण को "आयास्य आंगिरस" (अंगों का सार-रस) कहा गया, क्योंकि वह शरीर के समस्त अंगों का सारभूत रस है।
यह कथा उसी सिद्धान्त को दोहराती है जो प्रश्न उपनिषद् और केन उपनिषद् में भी देखा गया — शरीर की समस्त इन्द्रियाँ अपने-अपने कार्य में पाप से प्रभावित हो सकती हैं, परन्तु प्राण, जो इन सबका मूल आधार है, अविचल और अभेद्य रहता है। यह इसलिए है क्योंकि प्राण किसी विशिष्ट क्रिया में उलझा नहीं रहता — वह केवल जीवन का शुद्ध आधार है, इसलिए वह पाप के आक्रमण से परे रहता है। जो साधक प्राण की इस अजेय प्रकृति को समझ लेता है, वह भी जीवन के विघ्न-बाधाओं के प्रति उसी प्रकार अभेद्य हो जाता है।
इसी अध्याय में सूर्य के भीतर स्थित उस स्वर्णिम पुरुष का भी वर्णन आता है, जो दाहिने नेत्र में स्थित पुरुष के समान ही देखा जाता है — यह बाह्य और आंतरिक, दोनों जगत् में एक ही चेतना की उपस्थिति को दर्शाता है। अध्याय में एक व्यंग्यपूर्ण "श्वान-कथा" भी आती है, जिसमें कुत्तों का एक समूह पुरोहितों की भाँति एक-दूसरे की पूँछ पकड़कर अन्न-प्राप्ति के लिए गान गाता है — यह उन पुरोहितों पर एक सूक्ष्म व्यंग्य है जो यज्ञ के गहन अर्थ को समझे बिना केवल भौतिक लाभ के लिए कर्मकाण्ड करते हैं।
इस अध्याय का सार
शरीर की समस्त इन्द्रियाँ पाप और विघ्न से प्रभावित हो सकती हैं, परन्तु प्राण — जीवन का मूल आधार — सदा अभेद्य रहता है; उसी को पहचानने वाला साधक भी जीवन के विघ्नों से अप्रभावित रहता है।
साम-गान और सृष्टि का सामंजस्य (अध्याय 2)
दूसरा अध्याय साम-गान की उपासना को सम्पूर्ण सृष्टि पर विस्तृत करता है — यह सिखाता है कि पंच-विध साम (पाँच भागों वाला गान — हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार, निधन) केवल यज्ञ-मंच तक सीमित नहीं, बल्कि प्रकृति के हर चक्र में प्रतिबिम्बित होता है। वर्षा के चक्र में — हवा का उठना हिंकार है, बादल का बनना प्रस्ताव है, वर्षा का बरसना उद्गीथ है, बिजली-गरज प्रतिहार है, और वर्षा का थमना निधन है। इसी प्रकार यह गान वाणी, प्राण, नेत्र, कर्ण और मन में भी, तथा सम्पूर्ण लोकों की संरचना में भी देखा जाता है।
यह उपासना-पद्धति एक गहन अंतर्दृष्टि प्रस्तुत करती है — यह दिखाती है कि यज्ञ की पवित्र लय कोई मानव-निर्मित औपचारिकता नहीं, बल्कि सृष्टि की अपनी अंतर्निहित लय का ही मानवीय प्रतिबिम्ब है। जिस प्रकार वर्षा का चक्र आरम्भ, विकास, चरम, ह्रास और विराम के पाँच चरणों से गुज़रता है, उसी लय में मानव-जीवन के अनुभव, यहाँ तक कि श्वास की गति भी चलती है — यह उपासना साधक को प्रकृति और स्वयं के भीतर एक ही व्यापक सामंजस्य को पहचानने के लिए प्रेरित करती है।
अध्याय में सद्आचरण का भी उल्लेख आता है — जो कोई इस दैव-यज्ञ रूपी साम को जानता है, उसे किसी भी प्राणी को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए, सिवाय उन पवित्र अवसरों के जहाँ शास्त्र-सम्मत यज्ञ-कर्म हो। यह संकेत महत्त्वपूर्ण है — यह दिखाता है कि गहन आध्यात्मिक उपासना और नैतिक आचरण परस्पर अविभाज्य हैं; जो साधक ब्रह्माण्ड की लय को समझता है, वह स्वाभाविक रूप से अहिंसा और संयम के मार्ग पर चलता है, क्योंकि वह जान चुका होता है कि प्रत्येक प्राणी उसी एक व्यापक लय का ही अंग है।
इस अध्याय की गहनतम शिक्षा यह है कि साम-गान की उपासना केवल एक अनुष्ठान-विधि नहीं, बल्कि एक दृष्टि-प्रशिक्षण है — यह साधक को सिखाती है कि वह हर घटना में, चाहे वह वर्षा हो या श्वास, एक ही पाँच-चरण की लय को पहचानना सीखे। जब यह दृष्टि परिपक्व हो जाती है, तो जीवन की प्रत्येक घटना — जन्म से मृत्यु तक — उसी व्यापक, पवित्र गान का एक अंश प्रतीत होने लगती है, और साधक स्वयं को उस गान से पृथक् नहीं, बल्कि उसका ही एक स्वर अनुभव करने लगता है।
इस अध्याय का सार
वर्षा का चक्र हो या यज्ञ का गान, दोनों में एक ही पाँच-चरण की लय कार्यरत है — जो साधक इस सार्वभौमिक सामंजस्य को पहचान लेता है, वह प्रकृति और स्वयं के बीच के भेद को भी विसर्जित कर देता है।
मधु विद्या और गायत्री का रहस्य (अध्याय 3)
तीसरा अध्याय "मधु विद्या" (मधु-विज्ञान) से आरम्भ होता है — सूर्य को देवताओं के लिए मधु (शहद) कहा गया है, दिशाएँ उसके छत्ते हैं, और वेद वे पुष्प हैं जिनसे देवता-रूपी मधुमक्खियाँ यह मधु एकत्र करती हैं। वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत और साध्य — ये सभी देवगण सूर्य के विभिन्न भागों को अपना-अपना मधु मानकर उससे पोषण पाते हैं, और चारों वेद उनके लिए विभिन्न स्वादों वाले मधु के समान हैं। यह रूपक सूर्य को केवल एक भौतिक पिंड के रूप में नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के पोषण और आनंद के स्रोत के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
इसके पश्चात् उपनिषद् गायत्री मंत्र की गहनतम व्याख्या प्रस्तुत करती है — "गायत्री वा इदꣳ सर्वं भूतं यदिदं किञ्च" — यह जो कुछ भी अस्तित्व में है, वह सब गायत्री ही है, क्योंकि वाणी ही गायत्री है, क्योंकि वाणी ही गाती है (गायति) और रक्षा करती है (त्रायते) इस समस्त सृष्टि की। गायत्री के चार चरण बताए गए हैं — पृथ्वी, शरीर, हृदय और प्राण — परन्तु इनके अतिरिक्त एक चौथा, अदृश्य चरण भी है, जो सूर्य में दिखाई देने वाले उस पुरुष के रूप में, और हृदय-कमल के भीतर के आकाश के रूप में चमकता है।
इसी अध्याय में वह प्रसिद्ध उपमा आती है जो हृदय के भीतर के आकाश की विशालता का वर्णन करती है — "जितना विशाल यह बाह्य आकाश है, उतना ही विशाल यह हृदय के भीतर का आकाश भी है; इसके भीतर द्युलोक और पृथ्वी, दोनों समाहित हैं, अग्नि और वायु, सूर्य और चन्द्रमा, बिजली और तारे — यह सब कुछ, और जो कुछ इस लोक में है और जो नहीं है, वह सब इसी के भीतर समाहित है।" यह वर्णन बाह्य ब्रह्माण्ड और आंतरिक चेतना के बीच के अंतर को मिटा देता है — दोनों समान रूप से विशाल, समान रूप से गहन हैं।
अध्याय का समापन शाण्डिल्य विद्या के प्रसिद्ध सूत्र से होता है — "सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत" — यह सब कुछ निश्चय ही ब्रह्म है; इसी भाव से, शांत-चित्त होकर उपासना करनी चाहिए कि यह सब उसी से उत्पन्न होता है (ज), उसी में लीन होता है (ल), और उसी में श्वास लेता है (अन्)। यह सूत्र आगे यह भी बताता है कि हृदय के भीतर स्थित यह आत्मा चावल के दाने से भी छोटा है, फिर भी पृथ्वी से भी बड़ा, आकाश से भी बड़ा, समस्त लोकों से भी बड़ा है — यह वही ब्रह्म है, और इसी में इस लोक से प्रस्थान करने पर साधक प्रवेश करेगा, इसमें कोई संशय नहीं।
इस अध्याय का सार
हृदय के भीतर का आकाश बाह्य ब्रह्माण्ड जितना ही विशाल है — चावल के दाने से भी छोटा, फिर भी समस्त लोकों से भी बड़ा यह आत्मा ही "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" का साक्षात् प्रमाण है।
सत्यकाम जाबाल और राजा जानश्रुति (अध्याय 4)
चौथा अध्याय दो अत्यन्त मार्मिक कथाओं से भरा है, जो दिखाती हैं कि सच्चा ज्ञान जाति, कुल या समृद्धि पर नहीं, बल्कि सत्यनिष्ठा और विनम्रता पर निर्भर करता है। सत्यकाम, एक अविवाहित दासी जाबाला का पुत्र, जब गुरुकुल में प्रवेश के लिए गोत्र पूछा जाता है, तो अपनी माता से पूछता है। माता स्पष्ट कहती है कि उसे स्वयं नहीं पता कि उसका पिता कौन है, क्योंकि युवावस्था में सेवा-कार्य के दौरान वह अनेकों के सम्पर्क में आई थी — इसलिए वह उसे केवल इतना कहने की सलाह देती है कि "मैं सत्यकाम हूँ, जाबाला का पुत्र।"
गुरु गौतम हारिद्रुमत के सम्मुख जब सत्यकाम यह असुविधाजनक सत्य बिना किसी संकोच के कह देता है, तो गुरु प्रसन्न होकर कहते हैं — "इतना स्पष्ट सत्य कोई अ-ब्राह्मण नहीं बोल सकता" — और बिना गोत्र जाने ही उसे शिष्य बना लेते हैं, क्योंकि सत्यनिष्ठा स्वयं में ही सबसे बड़ी योग्यता है। गुरु उसे चार सौ दुर्बल गायों की देखभाल के लिए वन में भेजते हैं, यह कहकर कि जब ये एक हज़ार हो जाएँ तब लौटना। वन में रहते हुए, एक वृषभ, अग्नि, एक हंस और एक जलमुर्गी (मद्गु) — चारों उसे क्रमशः ब्रह्म के चार चरणों की शिक्षा देते हैं, और प्रत्येक शिक्षा के अंत में यह घोषणा करते हैं कि जो इसे जानता है, वह तेजस्वी होकर उस चरण के लोक का भोग करता है।
जब सत्यकाम गुरु के पास तेजोमय मुख के साथ लौटता है, गुरु तुरन्त पहचान लेते हैं कि उसे ब्रह्म-ज्ञान हो चुका है, और औपचारिक शिक्षा पूर्ण कर देते हैं, यह कहते हुए कि उसके ज्ञान में कुछ भी अधूरा नहीं रह गया। यह कथा दिखाती है कि सच्चा ज्ञान प्रकृति से, वन से, पशु-पक्षियों से भी प्राप्त हो सकता है, यदि साधक का हृदय शुद्ध और ग्रहणशील हो — औपचारिक गुरुकुल-शिक्षा उस आंतरिक तैयारी को पूर्णता ही देती है, उसका स्रोत नहीं होती।
इसी अध्याय की दूसरी कथा राजा जानश्रुति पौत्रायण की है, जो अपनी उदारता के लिए प्रसिद्ध था। एक रात दो हंस उड़ते हुए बातें करते हैं — एक दूसरे को चेतावनी देता है कि जानश्रुति के तेज को देखकर मत जल जाना, क्योंकि रैक्व नामक गाड़ीवान के पास उससे भी बड़ा तेज है। यह सुनकर व्याकुल राजा रैक्व को खोजने भेजता है, जो अपनी गाड़ी के नीचे खुजली खुजलाते हुए मिलता है। राजा गायों, स्वर्ण और रथ का प्रस्ताव देता है, परन्तु रैक्व तिरस्कारपूर्वक अस्वीकार कर देता है — "शूद्र, इन्हें अपने ही पास रख!" — अंततः जब राजा अपनी कन्या और एक सम्पूर्ण गाँव भी अर्पित करता है, तभी रैक्व प्रसन्न होकर उसे "संवर्ग विद्या" सिखाता है — वायु और प्राण ही वे "संवर्गक" (अवशोषक) तत्त्व हैं जिनमें अग्नि, सूर्य, चन्द्र और जल जैसे देवता, तथा वाणी, नेत्र, कर्ण और मन जैसी इन्द्रियाँ, नींद और मृत्यु में लीन हो जाती हैं।
इस अध्याय का सार
सत्यकाम का उदाहरण दिखाता है कि गोत्र या कुल नहीं, केवल निर्भीक सत्यनिष्ठा ही सच्चे शिष्यत्व की कसौटी है — और रैक्व की कथा दिखाती है कि सच्चा ज्ञान धन से नहीं, विनम्र समर्पण से ही अर्जित होता है।
प्राण की श्रेष्ठता और पंचाग्नि विद्या (अध्याय 5)
पाँचवाँ अध्याय पुनः इन्द्रियों के विवाद से आरम्भ होता है — वाणी, नेत्र, कर्ण, मन और प्राण, प्रत्येक स्वयं को श्रेष्ठ मानते हुए प्रजापति के पास न्याय के लिए जाते हैं। प्रजापति कहते हैं कि जिसके चले जाने पर शरीर की सबसे बुरी दशा हो, वही श्रेष्ठ है। वाणी एक वर्ष के लिए चली जाती है, परन्तु शरीर गूँगे व्यक्ति की भाँति जीवित रहता है; इसी प्रकार नेत्र, कर्ण और मन भी बारी-बारी से चले जाते हैं, और शरीर क्रमशः अंधे, बहरे और मूढ़ व्यक्ति की भाँति फिर भी जीवित रहता है। परन्तु जैसे ही प्राण प्रस्थान करने का उपक्रम करता है, वह शक्तिशाली अश्व की भाँति शेष सभी इन्द्रियों को उनकी जड़ों सहित उखाड़ देता है — तभी सब मिलकर प्राण से क्षमा माँगते हुए उसे सर्वश्रेष्ठ स्वीकार करते हैं।
इसके पश्चात् अध्याय पंचाग्नि विद्या की ओर मुड़ता है — एक सभा में राजा प्रवाहण जैवलि उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु से पाँच प्रश्न पूछते हैं: प्राणी मृत्यु के बाद कहाँ जाते हैं, वे कैसे लौटते हैं, देवयान मार्ग कभी क्यों नहीं भरता, पितृयान मार्ग कभी क्यों नहीं भरता, और किस बिंदु पर जल मानव-वाणी में बोलने लगता है? श्वेतकेतु, अपनी शिक्षा पर गर्वित होते हुए भी, इनमें से एक का भी उत्तर नहीं दे पाता। लज्जित होकर वह अपने पिता उद्दालक के पास जाता है, परन्तु पिता स्वयं भी इन प्रश्नों का उत्तर नहीं जानते — यह एक अत्यन्त उल्लेखनीय क्षण है, जहाँ एक क्षत्रिय राजा एक ब्राह्मण ऋषि को ज्ञान सिखाता है, वर्ण-व्यवस्था के परम्परागत क्रम को उलटते हुए।
राजा तब पंचाग्नि विद्या सिखाते हैं — स्वर्ग-लोक ही एक अग्नि है, जिसमें देवता श्रद्धा की आहुति देते हैं, जिससे सोम (राजा, अर्थात् वर्षा का बीज) उत्पन्न होता है; पर्जन्य (मेघ) एक अग्नि है, जिसमें सोम की आहुति दी जाती है, जिससे वर्षा उत्पन्न होती है; पृथ्वी एक अग्नि है, जिसमें वर्षा की आहुति दी जाती है, जिससे अन्न उत्पन्न होता है; पुरुष एक अग्नि है, जिसमें अन्न की आहुति दी जाती है, जिससे वीर्य उत्पन्न होता है; और स्त्री एक अग्नि है, जिसमें वीर्य की आहुति दी जाती है, जिससे नए प्राणी का जन्म होता है। यह पाँच-चरण की श्रृंखला बताती है कि जन्म का चक्र किस प्रकार ब्रह्माण्डीय यज्ञ की एक सतत प्रक्रिया के रूप में चलता रहता है।
इस विद्या का समापन यह स्पष्ट करता है कि जो साधक इन दो मार्गों — देवयान और पितृयान — में से किसी को भी नहीं जानते, वे एक तीसरी स्थिति को प्राप्त होते हैं — वे बार-बार छोटे-छोटे कीट-पतंगों के रूप में जन्म लेते और मरते रहते हैं। यह चेतावनी अत्यन्त गम्भीर है — यह दिखाती है कि अज्ञान का परिणाम केवल आध्यात्मिक हानि नहीं, बल्कि अस्तित्व की गुणवत्ता का ही पतन है। इसके विपरीत, जो साधक इस सम्पूर्ण चक्र को समझ लेता है, वह इस यांत्रिक पुनरावृत्ति से ऊपर उठकर सचेत रूप से अपने जीवन और मृत्यु को देख पाता है।
इस अध्याय का सार
प्राण के बिना शेष सभी इन्द्रियाँ निष्प्राण हैं, और जो पंचाग्नि विद्या के इस जन्म-चक्र को नहीं समझता, वह बार-बार क्षुद्र योनियों में भटकता रहता है — ज्ञान ही इस यांत्रिक पुनरावृत्ति से मुक्ति का द्वार है।
तत्त्वमसि — उद्दालक का उपदेश (अध्याय 6)
छठा अध्याय छान्दोग्य उपनिषद् का, और सम्भवतः सम्पूर्ण उपनिषद्-साहित्य का, सबसे प्रसिद्ध भाग है। उद्दालक अपने पुत्र श्वेतकेतु से, जो बारह वर्ष तक वेद पढ़कर गर्वित होकर लौटा है, पूछते हैं — "क्या तुमने वह शिक्षा माँगी, जिससे अनसुना भी सुना हुआ हो जाता है, अचिंतित भी चिंतित हो जाता है, अज्ञात भी ज्ञात हो जाता है?" श्वेतकेतु के अनभिज्ञ रहने पर पिता समझाते हैं — जैसे मिट्टी के एक ढेले को जान लेने पर मिट्टी से बनी समस्त वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है, क्योंकि परिवर्तन केवल नाम-मात्र है, वास्तविकता तो केवल मिट्टी ही है — वैसे ही एक तत्त्व को जान लेने से सब कुछ जाना जा सकता है।
उद्दालक तब सृष्टि के आरम्भ का वर्णन करते हैं — "सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्" — हे सौम्य, आरम्भ में यह केवल सत् (अस्तित्व) ही था, एक, अद्वितीय। उस सत् ने संकल्प किया — "मैं बहुत हो जाऊँ, मैं प्रजाओं को उत्पन्न करूँ" — और उससे तेज, फिर जल, फिर अन्न (पृथ्वी) उत्पन्न हुए। इसके पश्चात् वे मधुमक्खी की उपमा देते हैं — जैसे मधुमक्खियाँ विभिन्न वृक्षों से रस एकत्र कर उसे एक ही मधु में मिला देती हैं, और वह रस यह पहचान नहीं पाता कि "मैं अमुक वृक्ष का रस हूँ" — वैसे ही समस्त प्राणी, गहरी निद्रा में उसी सत् में विलीन होकर भी, यह नहीं जान पाते कि वे सत् में विलीन हो चुके हैं।
इसके पश्चात् नदियों की प्रसिद्ध उपमा आती है — जैसे पूर्व और पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ समुद्र में मिलकर केवल समुद्र हो जाती हैं, अपनी पृथक् पहचान खो देती हैं, वैसे ही समस्त प्राणी, चाहे वे सत् से ही उत्पन्न हुए हों, यह नहीं जानते कि वे सत् से उत्पन्न हुए हैं। और फिर वह सबसे प्रसिद्ध प्रयोग आता है — श्वेतकेतु को नमक जल में घोलकर रात भर छोड़ने को कहा जाता है; सुबह नमक दिखाई नहीं देता, परन्तु जल के हर भाग को चखने पर वह खारा ही मिलता है — यह इस अदृश्य परन्तु सर्वव्यापी उपस्थिति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसी क्रम में नौ बार यह महावाक्य दोहराया जाता है — "तत्त्वमसि श्वेतकेतो" — वह तू ही है, हे श्वेतकेतु!
यह महावाक्य वेदान्त के चार महावाक्यों में सर्वाधिक प्रत्यक्ष और सर्वाधिक व्यक्तिगत है — यह किसी दूरस्थ ब्रह्म की बात नहीं करता, बल्कि सीधे शिष्य को सम्बोधित करते हुए कहता है कि वह स्वयं ही वह परम सत् है, जिसकी खोज में वह भटक रहा था। अध्याय आगे और भी उपमाएँ देता है — गांधार से अपहृत, आँखों पर पट्टी बाँधकर छोड़े गए व्यक्ति की भाँति, जो किसी सहृदय व्यक्ति के मार्गदर्शन से ही घर लौट पाता है (गुरु की भूमिका का प्रतीक); और एक जीवंत वृक्ष की उपमा, जिसकी एक शाखा काटने पर भी वृक्ष जीवित रहता है, परन्तु जीवन-रस के सूख जाने पर सम्पूर्ण वृक्ष मुरझा जाता है — ठीक वैसे ही शरीर मरता है, परन्तु उसके भीतर का जीवन-तत्त्व कभी नहीं मरता।
इस अध्याय का सार
जैसे जल में घुला नमक अदृश्य होकर भी हर बूँद में व्याप्त रहता है, वैसे ही वह परम सत् दिखाई न देकर भी सर्वत्र व्याप्त है — और "तत्त्वमसि", वह तू ही है, यही इस सत्य की सबसे प्रत्यक्ष, सबसे व्यक्तिगत घोषणा है।
नारद-सनत्कुमार संवाद — भूमा विद्या (अध्याय 7)
सातवें अध्याय में नारद, चारों वेदों, इतिहास-पुराण (पाँचवें वेद), व्याकरण, गणित और अन्य अनेक विद्याओं में पारंगत होते हुए भी, सनत्कुमार के पास जाकर स्वीकार करते हैं कि वे केवल "मंत्र-वित्" (मंत्रों के ज्ञाता) हैं, आत्म-ज्ञाता नहीं, और शोक से मुक्त नहीं हो पाए हैं — वे शोक के पार जाने का मार्ग माँगते हैं। सनत्कुमार उत्तर देते हैं कि नारद ने अब तक जो कुछ भी सीखा है, वह सब केवल "नाम" (नाम-मात्र) है — इसके साथ ही एक क्रमिक साधना-यात्रा आरम्भ होती है, जिसमें प्रत्येक चरण पिछले से श्रेष्ठ सिद्ध होता है।
यह क्रम नाम से वाणी की ओर, वाणी से मन की ओर, मन से संकल्प की ओर, संकल्प से चित्त की ओर, चित्त से ध्यान की ओर, ध्यान से विज्ञान (बुद्धि) की ओर, विज्ञान से बल की ओर, बल से अन्न की ओर, अन्न से जल की ओर, जल से तेज (अग्नि) की ओर, तेज से आकाश की ओर, आकाश से स्मृति की ओर, स्मृति से आशा की ओर, और अंततः आशा से प्राण की ओर बढ़ता है — प्रत्येक चरण पर सनत्कुमार यह दिखाते हैं कि पिछला तत्त्व इस नए, व्यापक तत्त्व के बिना निरर्थक है, इसलिए यह नया तत्त्व श्रेष्ठ है। यह क्रमिक विस्तार साधक को यह सिखाता है कि ज्ञान की प्रत्येक परत के पीछे एक और गहरी, अधिक व्यापक परत विद्यमान है।
अंततः यह यात्रा "भूमा" (अनंत, विराटता) तक पहुँचती है — "यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा" — जहाँ कुछ और नहीं देखा जाता, कुछ और नहीं सुना जाता, कुछ और नहीं जाना जाता, वही भूमा है; जहाँ इसके विपरीत, कुछ और देखा-सुना-जाना जाता है, वह अल्प (सीमित) है। भूमा ही अमृत है, अल्प मर्त्य है। यह परिभाषा अत्यन्त सूक्ष्म है — यह अनंतता को आकार या मात्रा से नहीं, बल्कि अद्वैत अनुभूति से परिभाषित करती है: जहाँ द्वैत (देखने वाला और देखी जाने वाली वस्तु) पूर्णतः विलीन हो जाए, वही अनंत है।
सनत्कुमार अंततः घोषणा करते हैं कि यह भूमा और कुछ नहीं, स्वयं "अहम्" (मैं) ही है — नीचे, ऊपर, पश्चिम, पूर्व, दक्षिण, उत्तर, सभी दिशाओं में यही "मैं" व्याप्त है, यही सब कुछ है। जो साधक इस "मैं" को भूमा के रूप में उपासना करता है, वह आत्म-प्रेमी, आत्म-रत, आत्म-आनंदित होकर स्वराट् (स्वयं का शासक) बन जाता है — वह समस्त लोकों में स्वतंत्र गति प्राप्त करता है। इस उपदेश से नारद शोक के पार चले जाते हैं — यह दिखाते हुए कि शोक का अंतिम समाधान बौद्धिक ज्ञान की मात्रा में वृद्धि नहीं, बल्कि उस अद्वैत "मैं" की प्रत्यक्ष पहचान है, जो समस्त द्वैत और भेद से परे है।
इस अध्याय का सार
जहाँ द्वैत — देखने वाला और देखी जाने वाली वस्तु — पूर्णतः विलीन हो जाए, वही भूमा (अनंत) है; और यह भूमा और कुछ नहीं, स्वयं वह "मैं" है, जिसे पहचानने से ही नारद का शोक सदा के लिए समाप्त हुआ।
दहर विद्या और इन्द्र-विरोचन की शिक्षा (अध्याय 8)
आठवाँ और अंतिम अध्याय "दहर विद्या" से आरम्भ होता है — इस ब्रह्मपुर (शरीर-रूपी नगर) में एक छोटा कमल है (हृदय), और उसके भीतर एक छोटा-सा आकाश है — इसी के भीतर जो कुछ है, उसे ही जानने की खोज करनी चाहिए। यह आकाश उतना ही विशाल है जितना बाह्य आकाश — इसमें द्युलोक-पृथ्वी, अग्नि-वायु, सूर्य-चन्द्र, बिजली-तारे — सब कुछ समाहित है, और यह भी, जो इस लोक में है और जो नहीं है, वह सब भी इसी में समाहित है। यह आकाश शरीर की वृद्धावस्था या मृत्यु से प्रभावित नहीं होता — यही सच्चा, अजर-अमर ब्रह्मपुर है, जिसकी कामनाएँ सत्य हैं, संकल्प सत्य हैं।
इसके पश्चात् उपनिषद् की सबसे मार्मिक कथाओं में से एक आती है — इन्द्र (देवताओं के प्रतिनिधि) और विरोचन (असुरों के प्रतिनिधि), दोनों प्रजापति के पास बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन कर, उस आत्मा को जानने पहुँचते हैं जो पाप-रहित, जरा-मृत्यु-रहित, शोक-रहित, भूख-प्यास-रहित है। प्रजापति पहले उत्तर देते हैं कि आँख में दिखाई देने वाला प्रतिबिम्ब ही आत्मा है। दोनों संतुष्ट होकर लौट जाते हैं — विरोचन, इस उत्तर से पूर्णतः संतुष्ट, असुरों के पास लौटकर शरीर की ही पूजा और भोग-प्रधान जीवन-दर्शन का प्रचार करता है, यही कारण है कि असुरों की परम्परा में देहवाद (शरीर को ही सर्वस्व मानना) प्रमुख हो गया।
परन्तु इन्द्र मार्ग में ही एक दोष पहचान लेते हैं — यदि शरीर का प्रतिबिम्ब ही आत्मा है, तो शरीर के अलंकृत होने पर प्रतिबिम्ब भी अलंकृत होगा, शरीर के अंधे-लंगड़े होने पर प्रतिबिम्ब भी वैसा होगा, और शरीर की मृत्यु पर प्रतिबिम्ब भी मिट जाएगा — यह अमर आत्मा कैसे हो सकता है? वे पुनः लौटते हैं, और अतिरिक्त बत्तीस वर्षों के पश्चात् प्रजापति दूसरा उत्तर देते हैं — स्वप्न में विचरण करने वाला पुरुष ही आत्मा है। परन्तु इन्द्र पुनः दोष पाते हैं — स्वप्न में भी तो पीड़ा, भय और शोक का अनुभव होता है, यह भी अंतिम उत्तर नहीं हो सकता।
एक और बत्तीस वर्षों के पश्चात् प्रजापति तीसरा उत्तर देते हैं — गहरी, स्वप्न-रहित निद्रा में स्थित शांत चेतना ही आत्मा है। इन्द्र इसे भी अपूर्ण पाते हैं — गहरी निद्रा में तो व्यक्ति स्वयं को "मैं यह हूँ" के रूप में भी नहीं जानता, यह तो लगभग विनाश जैसा प्रतीत होता है। अंततः, कुल एक सौ एक वर्षों की दीर्घ साधना के पश्चात्, प्रजापति अंतिम, सम्पूर्ण सत्य प्रकट करते हैं — सच्ची आत्मा शरीर से सर्वथा मुक्त है, सुख-दुःख से परे है; जब वह इस शरीर से ऊपर उठकर, परम प्रकाश को प्राप्त कर अपने ही सच्चे स्वरूप में प्रकट होती है, वही उत्तम पुरुष है, वही अमर है, वही निर्भय है, वही ब्रह्म है। विरोचन की शीघ्र, अधूरी संतुष्टि और इन्द्र की दीर्घ, अथक जिज्ञासा के बीच का यह अंतर इस उपनिषद् का, और सम्भवतः सम्पूर्ण आध्यात्मिक साधना का, सबसे गहन पाठ है।
इस अध्याय का सार
विरोचन शीघ्र संतुष्ट होकर अधूरे सत्य — शरीर — को ही आत्मा मान बैठा, परन्तु इन्द्र की एक सौ एक वर्षों की अथक जिज्ञासा ने उसे शरीर से परे, सुख-दुःख से परे, उस अमर, निर्भय पूर्ण सत्य तक पहुँचाया।
