ऋग्वेद · ३ अध्याय, ५ खण्ड
ऐतरेय उपनिषद्
आत्मा से सृष्टि की उत्पत्ति, मनुष्य के तीन जन्मों का रहस्य, और "प्रज्ञानं ब्रह्म" के महावाक्य में चेतना के स्वरूप का निरूपण।
सृष्टि की रचना — आत्मा से जगत् तक (अध्याय 1)
ऐतरेय उपनिषद्, ऋग्वेद से सम्बद्ध, महिदास ऐतरेय ऋषि के नाम पर आधारित है, और यह ऋग्वेद की ऐतरेय आरण्यक का ही एक भाग है। यह अपेक्षाकृत छोटी उपनिषद् है, परन्तु इसकी सृष्टि-कथा असाधारण रूप से गहन है। यह इस उद्घोष से आरम्भ होती है — "आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्, नान्यत्किञ्चन मिषत्" — सृष्टि के आरम्भ में केवल आत्मा ही था, अकेला; उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं था, कुछ भी पलक नहीं झपका रहा था (अर्थात् कोई चेतन प्राणी विद्यमान नहीं था)। इस अकेले आत्मा ने संकल्प किया — "मैं लोकों की सृष्टि करूँ" — और इस प्रकार उसने विभिन्न लोकों — जल-लोक, प्रकाश-लोक, मृत्यु-लोक (पृथ्वी) और अंतरतम जल-लोक — की रचना की।
इसके पश्चात् आत्मा ने विचार किया — "अब ये लोक बन गए, अब मैं इन लोकों के रक्षक (लोकपाल) बनाऊँ" — और उसने जल से एक पुरुष का आकार गढ़ा। उस पुरुष को सेते हुए (ऊष्मा देते हुए), उसका मुख अंडे के छिलके की भाँति फूट पड़ा — मुख से वाणी उत्पन्न हुई, वाणी से अग्नि। इसी क्रम में नासिका फूटी, नासिका से प्राण, प्राण से वायु; नेत्र फूटे, नेत्रों से दृष्टि, दृष्टि से सूर्य; कान फूटे, कानों से श्रवण-शक्ति, श्रवण से दिशाएँ; त्वचा फूटी, त्वचा से रोम, रोम से वनस्पतियाँ; हृदय फूटा, हृदय से मन, मन से चन्द्रमा; नाभि फूटी, नाभि से अपान, अपान से मृत्यु; और जननेन्द्रिय फूटी, उससे वीर्य, वीर्य से जल — इस प्रकार शरीर के प्रत्येक अंग से एक इन्द्रिय-शक्ति, और उस शक्ति से एक ब्रह्माण्डीय देवता उत्पन्न हुआ।
यह वर्णन अत्यन्त विलक्षण है — यह मानव-शरीर और ब्रह्माण्ड के बीच एक प्रत्यक्ष, संरचनात्मक सम्बन्ध स्थापित करता है। मनुष्य का शरीर कोई ब्रह्माण्ड से पृथक् वस्तु नहीं, बल्कि उसी सृजन-प्रक्रिया का एक लघु-प्रतिरूप (माइक्रोकॉज़्म) है — जो शक्तियाँ बाह्य जगत् में अग्नि, वायु, सूर्य, दिशाओं और चन्द्रमा के रूप में कार्यरत हैं, वही शक्तियाँ मनुष्य के भीतर वाणी, श्वास, दृष्टि, श्रवण और मन के रूप में कार्यरत हैं। यह दृष्टिकोण आगे के भारतीय चिंतन में "पिण्डे ब्रह्माण्डे" (जो शरीर में है, वही ब्रह्माण्ड में है) के सिद्धान्त के रूप में स्थापित हुआ।
परन्तु यह देवता-समूह विशाल संसार-सागर में गिर पड़ता है, और आत्मा उन्हें भूख-प्यास से पीड़ित कर देता है। वे आत्मा से निवेदन करते हैं कि उन्हें एक ऐसा आवास दिया जाए जहाँ वे स्थिर होकर अन्न ग्रहण कर सकें। आत्मा पहले उनके सामने एक गाय लाता है — देवता संतुष्ट नहीं होते; फिर एक घोड़ा लाता है — फिर भी संतुष्ट नहीं होते; अंततः वह मनुष्य को लाता है, और देवता प्रसन्न होकर कहते हैं — "सुकृतं बत" — यह निश्चय ही सुंदर रचना है! यह घोषणा बताती है कि मनुष्य-शरीर ही वह श्रेष्ठतम आवास है जहाँ ये दिव्य शक्तियाँ पूर्णता से स्थापित हो सकती हैं — पशु-योनियों में यह सम्भव नहीं।
इसके बाद आत्मा प्रत्येक देवता को उसके उपयुक्त स्थान में प्रवेश करने का आदेश देता है — अग्नि वाणी बनकर मुख में प्रवेश करता है, वायु प्राण बनकर नासिका में, सूर्य दृष्टि बनकर नेत्रों में, दिशाएँ श्रवण बनकर कानों में, वनस्पतियाँ रोम बनकर त्वचा में, चन्द्रमा मन बनकर हृदय में, मृत्यु अपान बनकर नाभि में, और जल वीर्य बनकर जननेन्द्रिय में। अंत में भूख और प्यास भी आत्मा से अपना स्थान माँगते हैं, और आत्मा उन्हें इन्हीं देवताओं में सहभागी बना देता है — इसीलिए किसी भी देवता को दी गई आहुति में भूख-प्यास की भी सहभागिता मानी जाती है। यह सम्पूर्ण वर्णन दिखाता है कि मानव-शरीर देवताओं के निवास-स्थान के रूप में रचा गया एक पवित्र मंदिर है, न कि केवल मांस-मज्जा का ढाँचा।
इस अध्याय का सार
मनुष्य का शरीर देवताओं के निवास हेतु रचा गया श्रेष्ठतम आवास है — जो शक्तियाँ बाह्य जगत् में अग्नि, सूर्य, वायु के रूप में कार्यरत हैं, वही शक्तियाँ हमारे भीतर वाणी, दृष्टि और श्वास के रूप में कार्यरत हैं।
मनुष्य के तीन जन्म (अध्याय 2)
दूसरा अध्याय एक अत्यन्त मौलिक प्रश्न उठाता है — आत्मा शरीर में किस मार्ग से प्रवेश करती है, और मनुष्य के कितने जन्म होते हैं? उपनिषद् बताती है कि आत्मा ने विचार किया कि यदि वह वाणी, प्राण, नेत्र या श्रोत्र जैसे किसी सामान्य मार्ग से शरीर में प्रवेश करे, तो वह शरीर के सामान्य क्रिया-कलापों में उलझकर अपनी विशिष्टता खो देगी। इसलिए आत्मा ने मस्तक की उस सूक्ष्म संधि (विदृति, जिसे कपाल की सिवनी भी कहा जाता है) को विदीर्ण कर, उसी विशिष्ट द्वार से शरीर में प्रवेश किया — इसी द्वार को "हित" नाम से भी पुकारा गया, क्योंकि यह आत्मा के आनंद और शरीर के जीवन्त होने, दोनों का द्वार है।
इसके पश्चात् उपनिषद् मनुष्य के तीन जन्मों का एक अत्यन्त गहन सिद्धान्त प्रस्तुत करती है। प्रथम जन्म वह है जब पिता के शरीर के समस्त अंगों का सार-तत्त्व वीर्य के रूप में संचित होकर, माता के गर्भ में स्थापित होता है — इस क्षण को पिता का अपना ही पुनर्जन्म माना जाता है, क्योंकि पिता अपने ही सार को आगे प्रवाहित कर रहा होता है, अपने ही आत्मा को माता के शरीर में पुनः स्थापित कर रहा होता है। इस दृष्टि से पिता और पुत्र कोई दो पृथक् व्यक्ति नहीं, बल्कि एक ही निरंतरता के दो प्रकटीकरण हैं।
द्वितीय जन्म वह है जब बालक माता के गर्भ से जन्म लेता है — यह सामान्य अर्थों में जन्म कहलाता है। तृतीय जन्म, जो सबसे गहन है, तब घटित होता है जब पिता की मृत्यु के पश्चात् पुत्र उसके संचित कर्तव्यों, संस्कारों और उत्तरदायित्वों को अपने कंधों पर उठा लेता है — इस प्रकार पिता अपने पुत्र के माध्यम से ही आगे जीवित रहता है। इस तीन-जन्म सिद्धान्त का सार यह है कि व्यक्तित्व और वंश-परम्परा के बीच कोई कठोर विभाजन-रेखा नहीं — जीवन की धारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी, एक निरंतर प्रवाह के रूप में आगे बढ़ती रहती है।
इसी सन्दर्भ में उपनिषद् ऋषि वामदेव का उदाहरण देती है, जिन्होंने गर्भ में स्थित रहते हुए ही इस सत्य को पहचान लिया था, और शरीर के भीतर से इस ज्ञान के आधार पर ऊपर उठकर, स्वर्गलोक में समस्त कामनाओं को प्राप्त कर, अमरत्व को प्राप्त हुए। यह उदाहरण अत्यन्त साहसिक दावा करता है — यह दिखाता है कि आत्म-साक्षात्कार किसी विशेष आयु, अनुभव, या बाह्य परिस्थिति पर निर्भर नहीं करता; यह चेतना की एक अवस्था है जो सैद्धांतिक रूप से जीवन के किसी भी क्षण में — यहाँ तक कि जन्म से पूर्व भी — सम्भव है।
इस अध्याय का सार
मनुष्य के तीन जन्म — गर्भाधान, जन्म, और पिता के उत्तरदायित्वों का वहन — यह दिखाते हैं कि व्यक्ति और वंश-परम्परा के बीच जीवन एक निरंतर, अखंडित प्रवाह है, कोई कठोर विभाजन नहीं।
प्रज्ञानं ब्रह्म — चेतना का महावाक्य (अध्याय 3)
उपनिषद् का तीसरा और अंतिम अध्याय एक मौलिक प्रश्न के साथ अपने चरम पर पहुँचता है — "को अयमात्मेति वयमुपास्महे, कतरः स आत्मा" — यह जिस आत्मा की हम उपासना करते हैं, वह कौन है? कौन-सी वस्तु वास्तव में आत्मा है? क्या वह है जिससे हम देखते हैं, या जिससे सुनते हैं, या जिससे गंध ग्रहण करते हैं, या जिससे वाणी बोलते हैं, या जिससे मीठे-खट्टे का भेद करते हैं? या क्या यह हृदय और मन है — संज्ञान, आज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, दृष्टि, धृति, मति, मनीषा, जूति, स्मृति, संकल्प, क्रतु, जीवन-शक्ति, काम, वश — ये सब क्या हैं?
उपनिषद् का उत्तर अत्यन्त क्रांतिकारी है — यह कहती है कि ये सभी नाम, चाहे वे कितने भी भिन्न प्रतीत हों, वस्तुतः एक ही तत्त्व — प्रज्ञान (शुद्ध चेतना) — के ही विभिन्न नाम हैं। यह वही चेतना है जो ब्रह्मा है, जो इन्द्र है, जो प्रजापति है; यही चेतना समस्त देवताओं में है, यही पंच महाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) में है, यही समस्त छोटे-बड़े प्राणियों में है — चाहे वे अंडज हों, जरायुज (गर्भ से जन्मे) हों, स्वेदज (पसीने से उत्पन्न) हों, या उद्भिज (अंकुर से उत्पन्न) हों; घोड़े, गाय, मनुष्य, हाथी — जो कुछ भी श्वास लेता है, चाहे वह चलता हो, उड़ता हो, या स्थिर हो — यह सब प्रज्ञान से ही निर्देशित होता है, प्रज्ञान में ही प्रतिष्ठित है।
इस विस्तृत सूची के अंत में वह महावाक्य आता है जो सम्पूर्ण उपनिषद्-साहित्य के चार महावाक्यों में गिना जाता है — "प्रज्ञानं ब्रह्म" — चेतना ही ब्रह्म है। यह घोषणा दर्शाती है कि ब्रह्म कोई दूरस्थ, अमूर्त सत्ता नहीं, बल्कि वही चेतना है जो इसी क्षण हमारे भीतर देखने, सुनने, समझने और अनुभव करने का कार्य कर रही है। जिस प्रकार समुद्र की समस्त लहरें अंततः जल ही हैं, उसी प्रकार मन की समस्त वृत्तियाँ — स्मृति, संकल्प, इच्छा, विवेक — अंततः एक ही मूल चेतना की ही तरंगें हैं।
उपनिषद् का समापन पुनः ऋषि वामदेव के उदाहरण से होता है — इसी ज्ञान के द्वारा वे इस लोक से ऊपर उठे, स्वर्गलोक में समस्त कामनाओं को प्राप्त कर अमर हो गए। "प्रज्ञानं ब्रह्म" का यह महावाक्य विशेष रूप से इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि यह अन्य महावाक्यों — "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ), "तत्त्वमसि" (तू वही है), "अयमात्मा ब्रह्म" (यह आत्मा ब्रह्म है) — के साथ मिलकर वेदान्त के चार वेदों की चार आधारभूत उद्घोषणाओं का समूह बनाता है, प्रत्येक अपने-अपने वेद से जुड़ा हुआ, परन्तु सभी एक ही अद्वैत सत्य की ओर संकेत करते हुए — चेतना ही अंतिम, अविभाज्य वास्तविकता है।
इस अध्याय का सार
देखना, सुनना, स्मरण करना, संकल्प करना — ये सब भिन्न-भिन्न वृत्तियाँ प्रतीत होते हुए भी एक ही मूल चेतना की तरंगें हैं — यही चेतना ब्रह्म है, यही "प्रज्ञानं ब्रह्म" का महावाक्य है।
